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"संत श्री 1008 श्री खेतेश्वर महाराज" एवं " दुनिया भर में रहने वाले राजपुरोहित समाज को यह वेबसाइट समर्पित है" इसमें आपका स्वागत है और साथ ही इस वेबसाइट में राजपुरोहित समाज की धार्मिक, सांस्‍क्रतिक और सामाजिक न्‍यूज या प्रोग्राम की फोटो और विडियो को यहाँ प्रकाशित की जाएगी ! और मैने सभी राजपुरोहित समाज के लोगो को एकीकृत करने का ऐसा विचार किया है ताकि आप सभी को राजपुरोहित समाज के लोगो को खोजने में सुविधा हो सके! आप भी इसमें शामिल हो सकते हैं तो फिर तैयार हो जाईये! "हमारे किसी भी वेबसाइट पर आपका हमेशा स्वागत है!"
वेबसाइट व्यवस्थापक सवाई सिंह राजपुरोहित-आगरा{सदस्य} सुगना फाऊंडेशन-मेघलासिया जोधपुर 09286464911

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17.2.17

समाजहित में Sugana Foundation ने यह वेबसाईट ओर FB पर राजपुरोहित पेज एक तुच्छ प्रयास किया है

सन्त श्री तुलछाराम जी महाराज

                    प्रस्तावना

राजपुरोहित जाति वर्तमान राजस्थान के मारवाड, बीकानेर, जैसलमेंर, किशनगढ, सिरोही, बांसवाडा रियासतों में व मध्यप्रदेश की रतलाम, उज्जैन, सीतामउ रियासतों में तथा उतरी गुजरात के कुछ ईलाकों में काफी समय पूर्व से बसी हुई है। इस जाति का अतीत बहुत गौरवशाली है। प्राचीनकाल में जब राजा महाराजाओं का शासनकाल था तो सर्वश्रेष्ठ व कुलीन वेदपाठी ब्राह्मणों में से राजा महाराजाओं व अन्य शासकों द्वारा अपने राजपुरोहित का चयन किया जाता था। प्रारंभ में राजपुरोहित जाति नहीं होकर एक सर्वश्रेष्ठ व अत्यंत सम्मानित पद था। कालांतर में ब्राह्मणों में से जो जो अलग गौत्रों के राजपुरोहित थे उनमें परस्पर वैवाहिक संबंध होने लगे और बाद में राजपुरोहित का पद वंशानुगत हो गया और राजपुरोहित ने एक जाति का रूप ले लिया। राजपुरोहित राज्य के शासकीय, नैतिक, धार्मिक व न्यायिक क्षैत्रों में शासक का सर्वोच्च सलाहकार था। यहाॅ तक ही नहीं आवश्यकता पडने पर राजपुरोहित ने सैन्य संचालन भी बहुत ही बहादुरी व कुशलतापूर्वक किया। इस प्रकार यह जाति हमेशा जन्म से ब्राह्मण व कर्म से क्षत्रिय रही। शासकों द्वारा राजपुरोहितों को इनके शौर्य एवं वीरता के फलस्वरूप कई जागीरें बख्शी गई व कई तरह के सम्मान भी दिये गये।

राजपुरोहित को अपने नाम के आगे ठाकुर व नाम के पीछे सिंह लगाने का भी अधिकार था एवं जागीरदार कहलाते है। राजपुरोहित परस्पर अभिवादन में जय श्री रघुनाथजी की करते हैं। राजपुरोहित समाज ब्रह्मोत्तर भी कहलाती है। इस जाति में सेवड, सोढा, सियां, जागरवाल, मनणा, दूदावत, मकाणा, उदेश, रायगुर, राजगुरू, रायथला, सांथुआ, गुंदेचा, मुथा आदि लगभग एक सौ से उपर उपजातियां है। इस जाति की सर्वाधिक जनसंख्या वाले जिले क्रमशः बाडमेंर, पाली, जालोर, सिरोही, जोधपुर, बीकानेर व चुरू है।

राजपुरोहित जाति का अतीत अत्यंत गौरवशाली रहा है। वैदिक काल व उतर वैदिक काल में वसिष्ठ, विश्वामित्र, बृहस्पति, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि ऋषियों ने राजपुरोहित पद को सुशोभित किया। परशुराम जी जैसे महान् ऋषि ने इसी जाति में जन्म लिया। महान् संत श्री खेतेश्वरजी दाता, शिक्षा सारथि स्वामी श्री आत्मानंदजी सरस्वती, स्वामी श्री मोहनानंदजी सरस्वती आदि ने इसी जाति में जन्म लेकर इस जाति को गौरवान्वित किया।

आज भी इस जाति में कई महान् संत, महापुरूष, मनीषी व विचारक है। राजपुरोहित जाति के गौरवशाली अतीत को ध्यान में रखते हुये समाज सेवा व समाज सुधार हेतु सुगना फाउंडेशन मेघलासिया ने यह वेबसाईट  ( http://rajpurohitsamaj-s.blogspot.com ) ओर फेसबुक पर राजपुरोहित पेज https://www.facebook.com/rajpurohitpage/
एक तुच्छ प्रयास किया है। समय समय पर आप सभी समाज बंधुओं, विचारकों एवं मनीषियों के सुझाव एवं सहयोग मिलता रहेगा ऐसी आपसे आशा है।

                आपका अपना
  सवाई सिंह राजपुरोहित आगरा
                  सदस्य
सुगना फाउंडेशन मेघलासिया परिवार
Rajpurohit Samaj India WhatsApp No
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