व्यसन की मनुहार में भी भगवान व महापुरुषों की कसमें दी जाती हैं, ऐसी बुराई में तो उनका नाम मत लाओ : वेदांताचार्य
स्वामी आत्मानंद राजपुरोहित छात्रावास में आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन व्यास पीठासीन वेदांताचार्य डॉ.ध्यानाराम जी महाराज ने कहा कि हमें जीवन मे नीतिपूर्वक सुकर्म करने चाहिए। अनीतिपूर्वक कमाया गया धन और मान दोनों ही अंत मे व्यर्थ हो जाते हैं। विदुर और मैत्रीय ऋषि का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहाकि व्यक्ति सुख की कामना करता हुआ कर्म करता है, लेकिन पूर्ण सुख किसी को प्राप्त नहीं होता।
सुख की खोज करने वह बाहर जाता है, लेकिन बाहर भी सुख नहीं मिलता। क्योंकि आज के समय में आदमीतनाव भरा जीवन जी रहा है, जबकि सुख हमारे अंदर ही है, पर हम देख नहीं पाते। सत्संग ही सत्कर्म है। उसमें भी निष्काम भाव से भक्ति करनी चाहिए। ऐसा करने से ही वास्तविक सुख की प्राप्ति होगी।


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