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9.1.14

अमर वीर शिरोमणि श्री जगराम जी राजपुरोहित.. Räjpûrøhît Page

अमर वीर शिरोमणि श्री जगराम जी राजपुरोहित

                    बीकानेर पर अधिकार करने के लिए जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने दो बार आक्रमण किया था । पहले युद्ध की असफलता जोधपुर महाराजा के हृदय का कांटा बन चुकी थी। विक्रम सम्वत् 1797 (ई. सन् 1740) में जोधपुर महाराजा ने बीकानेर के विद्रोही ठाकुर लालसिंह (भाद्रा), ठाकुर संग्राम सिंह (चुरू) तथा ठाकुर भीम सिंह (महाजन) के साथ पुनः बीकानेर पर चढ़ाई कर दी । सर्वप्रथम देशनोक पहुंच कर करणी जी के दर्शन किए और बीकानेर नगर में प्रवेश कर नगर वासियों को लूटा ।

     नगर की लूट का समाचार सुनकर बीकानेर कुंवर गजसिंह काफी साथियों को लेकर जोधपुर की सेना व विरोधियों का सामना करने के लिये आए परन्तु महाराजा जोरावर सिंह ने उन्हें गढ़ के भीतर बुला लिया । जोधपुर की सेना लक्ष्मीनारायण जी के मन्दिर पास पुराने किले पर, एक सेना अनूपसागर, दूसरा मोर्चा उसी कुंए की पूर्वी ढाल पर, तीसरा मोर्चा दगल्या (दंगली साधुओं के अखड़े का स्थान) तथा दूसरी तरफ पीपल के वृक्षों के नीचे तोपें, पैदल सिपाही आदि थे । सूर सागर पूर्ण रूप से आक्रमणकारियों के हाथ में था एवं गिन्नाणी तालाब पर भी विद्रोहयों का अधिकार था।

                गढ़ के भीतर सेना महाराजा जोरावर सिंह की रक्षार्थ उपस्थित थी । उधर तोपों के गोलो की लगातार मार से गढ़ का बहुत नुकसान हो रहा था । मुख्यतः एक शंभुबाण नाम की तोप तो क्षण-क्षण पर अपनी विकरालता का परिचय दे रही थी। राजकुमार गजसिंह ने शंभुबाण के विरूद्ध मार्चा लिया और अपने बन्दूकचियो को उस तोप को ध्वस्त करने का आदेश दे दिया । क्योकि जोधपुर की तरफ से 8 सेर भर का एक गोला करण महल के आगे के खम्भों में से एक खम्भे पर आकर टकराया । एक गोला सूरजपोल उनमें और पुरोहित जगराम जी में पहले से कुछ खटपट थी। कंगारो पर गिरा जिससे 8-10 सैनिक मारे गए । जब राजकुमार गजसिंह सूर्य को अर्क दे रहे थे तब एक गोला उनके महल पर आकर गिरा । दीवार की ईटे राजकुमार पर आ पड़ी । मुहता आनन्दमल जो कि महाराजा जोरावर सिंह के मुसाहिब थे । उनके और पुरोहित जगराम जी के पहले से कुछ खटपट थी। मुहता आनन्दमल एक दिन जगराम जी की तरफ इशारा करते हुए बोले - ‘‘आप कहते थे कभी समय आने पर दो हाथ करके दिखाऊंगा अब मौका है, दिखाओं अपनी करामात ।’’ पुरोहित जी ने इन व्यंग्य भरे शब्दो की गांठ बांध ली और कुछ कर दिखाने की मन ही मन प्रतिज्ञा की ।
                              होली का दिन था । जोधपुर की फौजे घेरा डाले हुए थी शंभुबाण तोप क्षण-क्षण किले पर भीषण गोलाबारी कर रही थी, कुछ सैनिक होली का आनन्द ले रहे थे । पुरोहित जी ने महाराजा से गुप्त मंत्रणा के पश्चात् अपने कुछ विश्वासी सवारों के साथ शाम को शोर करते हुए एक साथ उन पर टूट पड़े । पहले ही हमले में शंभुबाण तोप पर अधिकार जमा कर उसका मुंह जोधपुर की सेनाओं की ओर कर दिया । इस अप्रत्याशित हमले से जोधपुर की सेनाओं में बड़ी भयानक अव्यवस्था फैल गई । उसी क्षण जोधपुर महाराजा को खबर मिली कि जोधपुर पर जयपुर के महाराजा जयसिंह ने आक्रमण कर दिया अतः जोधपुर की फौज भाग खड़ी हुई और नागौर पहुंच कर राहत की सांस ली । पुरोहित जी ने भी साहस दिखाकर उनसे कुछ साथियों के साथ झूझ रहे थे और खूब भगाया । इस गुप्त छापामार युद्ध में जगराम जी का सारा शरीर चोटो से छलनी हो गया था । एक तीर उनके सीधा नाभि में लगा, पर उन्होने एक झटके से बाहर निकाल फेंक दिया पर ऐसा करने से उनके पेट की आंते बाहर निकल आई फिर भी उस वीर ने कोई परवाह नहीं की। कमर कसकर शत्रु से झूझता रहा और जब तक कि शत्रु सेना के भय से बीकानेर मुक्त न कर दिया । शत्रु सेना को खदेड़ कर जब बीकानेर पर कोई आक्रमणकारी आस-पास न रहा तब महाराजा जोरावर सिंह को जीत का समाचार सुनाने गढ़ में पहुंचे । महाराजा ने पुरोहित जी को गले लगाया और उसी क्षण इस वीर की आत्मा स्वर्ग को प्रयाण कर गई। महाराजा को बहुत दुःख हुआ । उन्होने हुक्म दिया कि इस पुण्यात्मा स्वामिभक्त का स्मारक (छत्री) मेरे महल में ही जहां उनके प्राण निकले है उसी स्थान पर बनाई जाए किन्तु बाद में यह निर्णय हुआ कि यह स्मारक ऐसे स्थान पर बनाया जाए जहां से महाराजा प्रतिदिन अपने महल से ही दर्शन कर सके । इसलिए यह स्मारक नवगृह बुर्ज जूनागढ़ में स्थित है। स्मारक में प्रतिष्ठित शिलालेख के अनुसार हरनाथ सिंह जी पुरोहित के पुत्र जगराम जी का स्वर्गवास सम्वत् 1797 आषाढ़ शुक्ला एकम के दिन हुआ । जगराम जी के वीरगति प्राप्त करने पर गांव रासीसर उनके पुत्र देवकरण जी को दिया गया ।

                जगराम जी का जन्म बीकानेर के पास गांव देसलसर में सम्वत् 1775 में हुआ था । पिता हरनाथ सिंह जी बड़े बहादुर व्यक्ति होने के साथ-साथ अच्छे घुड़सवार थे । इस कारण अच्छे घोड़े रखने में उनकी विशेष रूचि थी । एक बार बादशाह ने उन्हे घोड़े पर सवारी करते हुए देखा तो बादशाह को उनका घोड़ा पसन्द आ गया। हरनाथ सिंह जी ने तत्काल घोड़ा बादशाह को नजर कर दिया और उसकी एवज में बादशाह ने हरनाथ सिंह जी को देसलसर गांव और अपने प्रधान सलाहकारो में नियुक्त कर फौज में बड़ा ओहदा दिया । अपने पिता के पद चिन्हों पर चलने के कारण जगराम जी बीकानेर रियासत के सेनापति रहे । इस वीर ने मात्र 12 वर्ष की युवावस्था में ही ऐसा रण कौशल दिखाया जो इतिहास के पन्नों में अंकित होकर अमिट ही नहीं बना बल्कि त्याग और बलिदान की याद दिलाने के लिए उनकी छत्री आज भी बीकानेर दुर्ग में मौजूद है। बीकानेर का झंडा ऊंचा रखने में अनेक वीर अपना रण कौशल दिखाकर शहीद हुए लेकिन दुर्ग में स्मारक केवल इसी वीर (जगराम जी) का निर्मित हुआ अन्य का नहीं ।

                    इस स्मारक और उनके रण कौशल पर राजपुरोहित समाज को आज भी नाज है। जगराम जी की एक छत्री देसलसर गांव में भी प्रतिष्ठित है

                                          भेजा गया :- श्री विक्रम सिंह  ठिकाना -लेता 

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