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2.11.25

राजपुरोहित समाज एक ऐसी जाति है जिसे बहुत उच्च दर्जे से देखा जाता है

क्या राजपुरोहित समाज का नाम एक उपाधि के कारण पड़ा? सत्य क्या है?

राजपुरोहित समाज एक ऐसी जाति है जिसे बहुत उच्च दर्जे से देखा जाता है। इसके बारे में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। यह योद्धा जाति अब बहुत कम संख्या में बची है, यहाँ तक कि राजस्थान में भी बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं। इसके नाम को लेकर कई दंतकथाएँ मौजूद हैं। इनमें से एक प्रमुख कथा यह है कि अलग-अलग ब्राह्मण, जो राजपुरोहित पद पर थे, उनसे मिलकर यह जाति बनी। एक अन्य मान्यता यह है कि राजपुरोहित नाम महज 50 वर्ष पहले ही पड़ा है, अन्यथा ये त केवल 'पुरोहित' ही थे। साक्ष्यों के अभाव में इस तरह की अनेक कथाएँ और कहानियाँ प्रचलित रही हैं। आइए, पड़ताल करते हैं कि आखिर सच्चाई क्या है? समाज के नाम को लेकर लोगों में इतनी गलतफहमियाँ क्यों हैं।

राजपुरोहित समाज मुख्यतः कृषि और युद्ध से जुड़ा रहा है। सांस्कृतिक तौर पर, राजपुरोहित, राजपूत और चारण समाज के त्रिक (trio) का हिस्सा रहे हैं। ये तीनों ही समाज शाक्त परंपरा से आते हैं, हालाँकि राजपुरोहित समाज में शैव धर्म की प्रधानता भी रही है।

प्राचीन काल में जब ऋषि-मुनियों का युग था, वे ही समाज को दिशा दिया करते थे। उस समय समाज वर्णों में नहीं बंटा था। पुरोहित मुख्य तौर पर समाज के शीर्षस्थ सदस्य होते थे। इन्हीं पुरोहितों में से कुछ लोग ऋषि बन जाते थे। ये ऋषि दो प्रकार के होते थे - 'राजऋषि' और 'ब्रह्मऋषि'। यह कोई वर्ण व्यवस्था नहीं थी। राजऋषि वे ऋषि होते थे जो राजदरबारों या राजाओं को मार्गदर्शन देते थे, जबकि ब्रह्मऋषि धार्मिक कार्यों तथा अन्य आध्यात्मिक क्रियाकलापों में संलग्न रहते थे।

जब समाज कार्य के आधार पर वर्णों में विभाजित होने लगा, तब ये ऋषि ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय बन सकते थे। अर्थात, पुरोहितों का समूह धीरे-धीरे वर्णाश्रम व्यवस्था में बँटने लगा। इन्हीं पुरोहितों में कुछ समूह ऐसे भी थे जिन्होंने कभी वर्ण व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। ये पुरोहित ज्यादातर युद्ध संबंधी कार्यों से जुड़े थे। इन्हीं पुरोहितों को 'राजगुरु पुरोहित' भी कहा जाता था। जो पुरोहित ब्रह्मऋषि बने और फिर ब्राह्मण वर्ण में स्थापित हुए, वे 'ब्राह्मण पुरोहित' कहलाए।

समय के साथ, ब्राह्मण पुरोहित कर्मकांडों में लिप्त होते गए, वहीं राजगुरु पुरोहित लगातार शासकों को निर्देशित करते रहे और युद्धों आदि में संलग्न रहे। इनका कर्मकांडी ब्राह्मण पुरोहितों से कभी कोई लेना-देना नहीं था और ये एक मुक्त तथा स्वतंत्र समाज के रूप में दूरस्थ इलाकों में स्थापित होते गए। परन्तु लगातार युद्धों में भाग लेने, कठोर सामाजिक नियमों का पालन करने तथा विपरीत परिस्थितियों में रहने के कारण इनकी संख्या लगातार घटती गई। वहीं, वर्ण व्यवस्था में बँधे ब्राह्मण पुरोहित समय के साथ स्थापित भी हुए और उनकी शक्ति भी बढ़ी।

ये रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाले राजगुरु पुरोहित प्राकृत भाषा बोलने वाले लोग थे, जो कालांतर में मारवाड़ी भाषा के रूप में विकसित हुई। इन्हीं के कारण इनके स्थानीय नाम अस्तित्व में आए, जैसे प्रोहित, पिरोयत, परोत इत्यादि, परंतु आधिकारिक रूप से ये 'राजगुरु पुरोहित' के रूप में दर्ज होते थे।

समय के साथ, जैसे-जैसे वर्ण व्यवस्था का प्रभाव बढ़ा, इन राजगुरु पुरोहितों का प्रभाव और शक्ति क्षीण होती गई और ये अपना ऐतिहासिक स्वरूप खोते गए। अब ये अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष करने लगे और अपनी क्रमबद्ध साहित्य रचना से वंचित रहने लगे। वर्णव्यवस्था के प्रभाव में लोग इन्हें भूलवश ब्राह्मण पुरोहित समझने लगे। कहीं-कहीं, समझ और जानकारी के अभाव में, ताम्रपत्रों और देवलियों पर 'ब्राह्मण' शब्द लिख दिया जाता था, जिससे इनके बारे में और अधिक भ्रामक जानकारी फैलने लगी। इसी भ्रम को दूर करने के लिए, भाट-बहियों में इनकी उत्पत्ति बताने हेतु ब्राह्मण उत्पत्ति का सहारा लिया जाने लगा, जबकि कई जगह इस समाज की कुछ गोत्रों की उत्पत्ति राजपूत जातियों से या अग्नि से बताई गई। कालांतर में उत्पन्न हुए इसी भ्रम तथा पूर्ण जानकारी के अभाव से ऐसी स्थितियाँ पैदा हुईं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रारंभिक कालखंड में ब्राह्मण को ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न तथा पुरोहितों को अग्नि से उत्पन्न होने की बात कही गई थी।

अब राजगुरु पुरोहित समाज एक ऐसा समुदाय बनकर रह गया था, जिसने अपने प्राचीन गुणों को समेटे रखा था, और जिसके बारे में लोगों के लिए उसे राजपूत, पुरोहित अथवा ब्राह्मण के खाँचों में विभेदित करना कठिन हो गया। जब राज्यों में राजपुरोहित पद का अनिवार्यकरण होने लगा, तो जहाँ ब्राह्मण पुरोहित प्रभावी थे, वे वहाँ राजपुरोहित बने; और जहाँ राजगुरु पुरोहित प्रभावी थे। वे वहाँ राजपुरोहित बने। ब्राह्मण पुरोहित राजपुरोहित पद पर वंशानुगत नहीं थे, परंतु राजगुरु पुरोहित वंशानुगत थे और उन्हें अपने गुणों के कारण 'राजपुरोहित' जाति का टाइटल भी मिला। यह टाइटल हमें 16वीं शताब्दी के एक राजपुरोहित सती जी के शिलालेख के माध्यम से पता चलता है। इससे पता चलता है कि देशज नामों के साथ-साथ आधिकारिक नाम, जैसे 'राजगुरु पुरोहित' अथवा 'राजपुरोहित' भी खूब प्रचलित थे।

1910 में राजपुरोहित हितकारिणी सभा, बीकानेर की स्थापना से हमें ज्ञात होता है कि 'राजपुरोहित' टाइटल का प्रयोग बिल्कुल भी नया नहीं है। बाद में, एकरूपता तथा अपनी स्वतंत्र पहचान कायम करने के लिए यह नाम संपूर्ण समाज द्वारा अपनाया गया। इस प्रकार हमें पता चलता है कि साक्ष्यों के अभाव में राजपुरोहित समाज का जबरन ब्राह्मणीकरण करने का प्रयास समय-समय पर किया गया, परन्तु ये प्रयास कामयाब नहीं हो सके। एक समाज, जिसके लिए एक समय अपना अस्तित्व बचा पाना भी मुश्किल रहा हो, उससे आधिकारिक दस्तावेजीकरण की उम्मीद करना उचित नहीं है।

30.6.25

राजगुरूओ के गाँव गौत्र और जिले

मैं बलवन्त सिंह राजगुरू राजपुरोहित कोलासर कि और से सभी राजपुरोहित जागीरदारों को "जय श्री रघुनाथ जी री सा" हुकुम मैं आज आप सभी को राजगुरू राजपुरोहित जागीरदारो के गाँवो के बारे मैं बता रहा हुँ सा । हाँ एसा हो सकता कोई गाँव भुल से छुट जाये या एसा भी हो सकता हैं कि किसी गाँव का नाम में गलती भी हो सकती हैं
तो कृपया नाराजगी ना जताये बल्कि उस गलती से अवगत कराये ।

1 - राजगुरू - सभी राजगुरू अजारी से निकले है । जिन - जिन को ग्राम स्थान मिले उसके पीछे इनके पुर्वजो कि शोर्यशाली गाथांए रही है । उन
सभी को दर्शाना चाहें तो एक मात्र राजगुरू गौत्र पर ही एक ग्रंथ तैयार हो सकता है । इस लिए हम यहाँ सिर्फ राजगुरूओ के गाँव गौत्र और जिले
ही दर्शायेंगे । 
1 जालौर - रानीवाङा तहसील 1
डूंगरी - राजगर
2 गोलवाडा - सटीयातर राजगर
3 - सेवाडीया - सटीयातर+ हिंडवाडीया 4
रानीवाङा खुर्द - सटीयातर + पंड्या 5 - जैतपुर -
सटीयातर 6 - सेवदा - सटीयातर
7 - करडा - सटीयातर
8 - चितरूडी - पादरेसा
तहसील - भीनमाल
9 - पूनासा - राजगर
10 - भीनमाल - राजगर
11 - नासोली - राजगर
12 - धसैडी - राजगर
13 - सलतरा - राजगर
तहसील सांचौर
14 - सांचौर - राजगर + पंड्या + औझा 15 -
भावतङा - राजगुरू
16 - तांपी - राजगुरू +वीरपुरा + राजगर 17 - रतैङा -
राजगर
18 - जान्वी - फोणरीया
19 - आंबली - राजगर + पंड्या + औझा 20 -
हिंडवाडा - राजगर
21 - चितलवाना - राजगर + वीरपुरा 22 - कैरीया -
वीरपुरा + राजगर
23 - रणौधर - राजगुरू
24 - हैमागुडा - पंड्या ( राजगुरू ) 25 - सिवाङा -
राजगुरू
26 - झोटडा - राजगुरू
27 - देवङा - राजगुरू
28 - धमाना - राजगुरू + पंड्या
( राजगुरू )
29 - धुंम्बडीया - राजगुरू
30 - तात्रा - राजगुरू + पंड्या 31 अन्खोल -
पंड्या ( राजगुरू ) 32 - भाडवाल - पाडे ( पंड्या )
जनश्रुतियों के भहुमत के आधार पर कि पंड्या राजगुरू
ही है । इसीलिए हमने बुजुर्गों को मान्यता दी ( राव
भी इसकि पुष्टि करते है ।) इन्ही के द्वारा स्वीकार
किया गया है । कि इनका गाँव लुणावास के पास
जो स्थित है । एंव मूल में राजगुरू ही है । 33 - जोधावास
- औझा
34 - दैवङा - राजगर
35 - भदरूना - राजगर
36 - गोलासना - पंड्या सरकार
( पंड्या के आगे सरकार कैसे
लगा इसकि जानकारी नहीं हैं इसके लिए
माफि चाहुंगा )
37 - धुदवा - पोडे ( पंड्या राजगर ) 38 - मैदा -
पंड्या 39 - सुथडी - राजगर
40 - जोरदर - राजगर
41 - मैलावास - पंड्या
42 - सरवणा - पंड्या
43 - जयसला - पंड्या
सायला पंचायत समिति
44 - बवतरा - राजगर
45 - सुराना - राजगर
46 - टीलौडा - राजगर
47 - चौराउ - राजगर
जालौर पंचायत समिति
48 - बाकरा - मदपङ + बोहरा
49 - रायपुरीया - मदपङ
50 - डूडसी - वोरा
51 - समुजा - राजगर
आहौर पंचायत समिति
52 - भवरानि - राजगर
53 - गोविंदला - बोहरा
54 - नीलकंठ - बोहरा
55 - छीपरवाडा - बोहरा
56 - थानवाला - बोहरा ( राजगुरू ) 57 - पावटा -
राजगर
58 - गुडा बालोतरान - राजगुरू
59 - आगवाङी - राजगुरू
60 - रोडला - राजगुरू
61 - मूलेवा - बोहरा
62 - ओडवाङा - राजगर
जसवंतपुरा पंचायत समिति
63 गोलना - राजगर
जिनके आगे राजगर/राजगुरू नहीं लिखा है वो सब के सब
राजगर ही बोलते हैं पर हैं तो राजगुरू ही पर भाषा में
फर्क होने से राजगर बोलने लग गये। इसलिए
उनकि बोली में ही दर्शाया हैं । इसमें कई जगह +
का निशान लगा कर आगे दूसरी राजगुरू
जाती लिखी हैं उसका उस जगह एक से ज्यादा राजगुरू
जातीयाँ है ।
जिला सिरोही
सिरोही पंचायत समिति
64 - जवल - मदपङ ( राजगर )
65 - मनोरा - सनपुरा
66 - चाडुआल - आमैटीया
67 - फुंगणी - सनपुरा
68 - सनपुर - सनपुरा ( इसी गाँव के नाम पर
सनपुरा जाती का नाम
पङा )
69 - बरलूट - मदपङ
70 - आम्बलारी - सनपुरा
71 - बावली - मदपङ
रेवदर पंचायत समिति
72 - धान - राजगर
73 - निम्बज - कोठारीया
74 - सेलवाडा - राजगर
75 - पैंतीसरा - राजगर
76- वान - राजगर
77 सिरोडी - राजगर
78 - सनवाडा - राजगर
79 - असावा - राजगर
80 - धंधपुर - राजगर
पिंडवाडा पंचायत समिति
81 - भार्जा - राजगर
82 - उदारा - मदपङ
83 - अजारी - राजगर ( यह वही अजारी है
जहाँ राजगुरू कि उत्पत्ति हुई थी यहीं पर
इनकि कूलदेवी माँ सरस्वती का भव्य मन्दिर है , और
यहीं पर संसार कि पहली सति हुई है वो भी राजगुरू थे ।
अजारी के राजगुरूओ को छोङ और राजगुरू
यहाँ का पानी नही पीते 84 - कोतल - मदपङ + राजगर
85 - आर्दश डूंगरी - राजगर
86 - पिंडवाडा - राजगर
आबू रोङ पंचायत समिति
87 - और - राजगर
88 - खादत - राजगर
शिवगंज पंचायत समिति
89 - कैलाश नगर - राजगर ( मदपङ )
90 - मनदार - वोरा ( राजगर )
जिला बाडमैर
गुडामालानी पंचायत समिति
91 - जालिखाडा - राजगुरू
92 - भैलावा - राजगुरू
93 - बन्ता - राजगुरू
94 पाडा - राजगुरू
95 - उधाडी - राजगुरू
96 - पोयला काला - राजगुरू
97 - पादर्ली - राजगुरू
98 - पीपराली रोली - राजगुरू
99 - पायला खुर्द - राजगुरू
100 - सिन्धरी - राजगुरू ( भंवरीया ) 101 - धन्वा -
राजगुरू
बाडमैर पंचायत समिति
102 - बालैरा - राजगुरू
103 - गैन्हु - राजगुरू
104 - लांगैरा - राजगुरू
105 - रड्वा - राजगुरू
106 - कनौङ - राजगुरू
( भंवरीया )
107 - महाबार - भंवरीया
( राजगुरू )
तहसील सीवाना
108 - गुडानाल - राजगुरू
109 - लुडराडा - राजगुरू
110 - पादरू - राजगुरू + भंवरीया 111 - समनीया -
राजगुरू
112 - सिलौर - राजगुरू + पांड्या ( यह वही सिलौर
है, जो भगवान श्रीराम जी के विवाह में वशिष्ठ
जी को राजा दशरथ जी ने जागीरी में दी थी । और
इसी गाँव के पिछे राजगुरू काफि सिलौरा कहने लगे ।
बुजुर्गों के अनुसार यह भी कहावत हैं कि "संसद बङी कै
सिलौर"
इसका यह अर्थ है कि राजा महाराजाओ के शासन मैं
सिलौर से बङी संसद नही था । मैं बलवन्त सिंह राजगुरू
( सिलौरा ) कोलासर । )
113 - सिवाना - राजगुरू
चौहटन
114 - खाखूसर - राजगर
115 - वयानो कि ढाणी - राजगर
116 - चौहटन - राजगुरू
117 - सुरूपों का तला - राजगर
118 - मिया का तला - राजगर
119 - पमै का तला - राजगर पंचपदरा 120 - आराबा -
राजगुरू
121 - डोली - राजगुरू
122 - कनना - राजगुरू
123 - खर्वा - राजगुरू
124 - कल्याणपुरा - राजगुरू
125 - पटाउ - राजगुरू
126 - पंचपदरा - राजगुरू
127 - खेडा सोढा - राजगुरू
128 - थोब महेशा - राजगुरू
129 - ढैरीया - राजगुरू
तहसील शीव
130 - बालासर - राजगर
131 - वीसु खुर्द - राजगर
132 - जूडिया - राजगर
133 - वरीपाडा - राजगर
134 - धराई - राजगर
135 - राजदल - राजगर
136 - कोटडा - राजगर
137 - आकली - राजगर
जिला पाली
रोहित पंचायत समिति
138 पाति - राजगर
139 - वायद - बोहरा
140 - सीराणा - राजगर
141 - भंवरी - राजगर
142 - जवाडीया - बोहरा ( जवाली से आकर बसे )
143 - खेरवा - आमैटीया
144 - मौडल - आमैटीया
145 - बुसी - बोहरा
146 - चाचौङी - आमैटा + पांड्या
147 - दयालपुरा - राजगर
सोजत
148 - बलाडा - राजगर
149 - धनैरीया - राजगर
रायपुर
150 - झुठा - राजगुरू
मारवाड जक्शन
151 - आउवा - राजगुरू
152 - काडु - राजगुरू
153 - गुडा मोकन सिंह - राजगुरू 154 - धानला -
बोहरा ( राजगर )
155 - ईसाली - बोहरा
156 - देवली आउवा - बोहरा
157 - बाता रूगनाथगढ - बोहरा
158 - गदन - बोहरा
159 - मैलावास - राजगुरू
160 - हैमलीयावास खुर्द - आमैठा 161 - दूदाङ - मदपङ
देसूरी
162 - नदनाभतन - राजगर + पंड्या
163 - गीलारी - राजगर
164 - जावली - वोरा + आमैटा
165 - रानी गाँव - आमैटा
बाली सुमैरपुर
166 - दूजाना - मदपङ
167 - पुरखीया - राजगर
168 - पुराडा - राजगर
169 - सुमैरपुर - राजगर
170 - कौरटा - राजगर ( इन्हें चावण्डीया भी कहते है
चामुण्डा माता जी कि पुजा करने के कारण ) 171 -
बरवा - पीडीया ( राजगर )
172 - लुणावा - पीडीया
173 - बोया - राजगर
174 - बीजापुर - राजगर
175 - पीचवा - मदपङ
176 - बाली - राजगर
177 - श्री सेला - राजगर
178 - भीतवाल - राजगर
179 - खुडाला - राजगर
180 - फलाना गाँव - राजगर
181 - सदैराव - बोहरा
182 - ढोला - मदपङ
183 - पावा - राजगर
184 - धाना - राजगर
जिला जोधपुर
शेरगढ
185- बुडकिया - राजगुरू
186 - ऊँटाबर - राजगुरू
187 - खेजा - राजगुरू
188 - सुंथला - राजगुरू
फलोदी
190 - मौर्या मुझर - राजगुरू
191 -बाप - राजगुरू
192 - बावङी खुर्द - भंवरीया
( राजगुरू )
जोधपुर
193 - फिंच - राजगुरू
194 - लूणी जंक्शन - पीडीया
( राजगुरू )
195 - थबुकडा - पीडीया ( राजगुरू ) 196 - ओडा -
पीडीया ( राजगुरू )
197 - लूणावास काला - पीडीया ( राजगुरू ) 198 -
कदवाङ - राजगुरू
औसीयां
199 - बासणी राजगुरू - राजगुरू 200 - थोब - राजगुरू
201 - मथानीया - राजगुरू
202 - नैवरा - राजगुरू
203 - पंडित कि ढाणी - राजगुरू
204 - बारा - राजगुरू
तहसील भोपालगढ
205 - गढेरी - राजगर
206 - मलार - भंवरीया ( राजगुरू ) बीलाङा 207 -
जाटीयावास - राजगर
208 - बाला सती - राजगर
209 - बीलाङा - राजगर
210 - सिलारी - राजगर
211 - मालकौसनी - राजगर
जिला चूरू
212 - कोलासर ~ राजगुरू ( मैं बलवन्तरामेश्वर सिंह
राजगुरू दादोसा स्वर्गीय ठाकुर श्री कुम्भ सिंह
जी कोलासर ) 213 - धीरदैसर - राजगुरू 214 - डुंगरगढ़ -
राजगुरू
215 - जालैवु - राजगुरू
216 - भोजास - राजगुरू
धीरदैसर, डुंगरगढ़, जालैवु, भोजास ये चार गाँव पहले चूरू
जिले में थे, अब वर्तमान में बीकानेर जिले में हैं ।
जिला बीकानेर
217 - कोलायत - राजगर
218 - किशनासर - राजगुरू
219 - जयमलसर - राजगुरू
220 - कानासर - राजगुरू
221 - बीकानेर शहर - राजगुरू ( दूसरे गाँवों से आकर बसे )
222 - शिवनगर - राजगर
223 - गणैश वाङी - राजगुरू
जिला नागौर
224 - लैसल - राजगुरू
225 - चावण्डीया - राजगुरू
226 - बोरावङ - राजगुरू
227 - मीठङी - राजगुरू
228 - भाखररोङ - राजगुरू
229 - शंखवाथ - राजगुरू
230 - रींया - राजगुरू
231 - मादलीया - राजगुरू
232 - रैण - राजगुरू
233 - गौलाङा - राजगुरू
234 - जाटावास - राजगुरू
जिला अजमेर
235 - परड - राजगुरू
जिला जैसलमेर
236 - लाखा - भंवरीया ( राजगुरू ) 237 - फतेहगढ -
राजगुरू
जिला राजसंमद + उदयपुर
238 - सैवन्त्री - राजगुरू
जिला श्री गंगानगर
239 - सुरतगढ - राजगुरू
240 - पीलीबंगा - राजगुरू
241 - भालेलीया - राजगुरू
242 - हरीपुरा - राजगुरू
सीवाङा ( राजगुरू )
जिला जालौर
243 - फतापुरा - सीरवाङा ( 4 घर ) पुरे राजस्थान में
ये चार परिवार ही हैं । लेकिन ये सीरवाङा जाती के
बारे में कोई जवाब नहीं देते हैं । (शिक्षा) कि कमी के
कारण ।
डीसा के राव श्री कान्ती लाल जी, रतन जी, एंव
मादा जी के द्वारा विस्तृत चर्चा पर निर्णय
चोपङो के आधार पर कि ये वास्तव में राजगुरू ही है ।
सीरवाङा गाँव के पीछे इन्होंने अपनी मूल
जाती को छोङ दीया और गाँव
को ही जाती मान लिया इसमें हमारा दोष नहीं हैं ।
यजमान समर्थन हैं । इनको बार बार कहने पर
भी सीरवाङा ही कहते हैं । बलवन्त राजगुरू ( सिलौरा )
कोलासर चूरू मो. 08696201712
Mail - balwant.rajpurohit1@gmail.com

राजगुरु वंश कि कुलदेवी सरस्वती माता अजारी तहसील पिंडवाड़ा सिरोही

 श्रृंगार दर्शन राजगुरु वंश कि कुलदेवी सरस्वती माता अजारी तहसील पिंडवाड़ा सिरोही राजस्थान


जय माता दी 
माता रानी आपकी सभी मनोकामना को पूर्ण करें टीम सुगना फाउंडेशन और राजपुरोहित समाज इंडिया

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26.5.24

आईए जानते हैं बिछावाडी गांव का इतिहास

राजपुरोहित समाज इंडिया आपके लिए समय-समय पर कुछ रोचक जानकारियां लेकर आता है इसी कड़ी में हम लेकर आए हैं बिछावाडी गांव की संचित जानकारी

जागीरदार समाज विठ्ठला (राजपुरोहित)
विठ्ठलापुर- बिछावाडी (वर्तमान नाम)

गुजरात में जिनको "ठाकर" एवं "जागीरदार" की उपाधि दी गयी है, सवंत १९९४ में राजाराम वासुदेव जी नामक राजा ने जागीर प्राप्त की थी, उनके नाम पर से गाँव का नाम विठ्ठलपुर रखा गया और समय उपरांत नाम बिछावाडी में तब्दिल हुआ।

गौत्रः भरद्वाज, कुलः खेतेस्वर काची, नदी: सरस्वती साखः माध्वनि, गणेशः गजकर्ण, कुलदेवी : माहाकाली (भवानी) वेदः यजुर्वेद

धिक बलं क्षत्रिय बलं, ब्रह्म तेजो बलं बलं। एकेन ब्रह्म दण्डेन, सर्वस्त्राणि हतानि में। विप्र वंश करि यह प्रभुताई। अभय होहुँ जो तुम्हहिं डेराई।

विशेष नोट:-  कोई गलती दिखी, या कोई जानकारी गलत लगे , तो यहां बताएं 

11.6.23

मारवाड़ राज्य में राजपुरोहितो का अतुल्य योगदान

 राजपुरोहितों का योगदान 

राजा के हार जाने पर राजकुल की रक्षा का दायित्व राजपुरोहित का होता था । पृथ्वीराज की हार के बाद रानियों को एक पुरोहित लेकर वन के रास्ते रोहतक पहुँचा । वह परिवार आज भी है । उनमें से एक महिला दिल्ली में प्रोफेसर हैं । उन्होंने अपने परिवार का इतिहास बताया, उस रक्षक ब्राह्मण के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।
हमने राजपुरोहितों का योगदान भुला दिया है । लोग नहीं जानते कि जौहर व्रत में रानियों की आत्माहुति के पहले ब्राहमण पुरोहित अग्नि में प्रवेश करता था । जौहर व्रत का संकट आने पर तीन दिनों निराहार जागरण करते हुए पुरोहित गायत्री मंत्र का जप करता था और अग्नि में प्रवेश कर जाता था। तत्पश्चात रानियाँ आत्माहुति देती थी। 

जौहर जैसा आपदधर्म वैदिक धारणा पर आधारित है। यज्ञाग्नि सूर्य का प्रवेश द्वार है। अग्नि ही देहपूर्व आत्मलोक है । सम्सत पेशवाई अनुग्रहित है राजपुरोहितो की । राजस्थान में ना जाने कितने वंशो की रक्षा दायित्व राजपुरोहितो ने निभाया है ।

अनेक राजपूतों का आपसी विवाद में अपने प्राण देखकर उनका विवाद सुलझाया है वह राजपुरोहित जब भी भारी संकट आया तभी तलवार लेकर आगे आकर क्षत्रिय की रक्षा की आज वह समाधिया उनकी वीरता की गवा दे रही है। मारवाड़ राज्य में राजपुरोहितो का अतुल्य योगदान और समय समय पर बलिदान भी दिया है सैंकड़ों उदाहरण है इसकी अवेज में राजपुरोहितो को ठिकाने, ओर शासन जागिरिया प्राप्त हुई है ।

26.6.22

राजपुरोहित जाति का इतिहास की कुछ बुको के नाम ओर कहा मिलेगी

1. राजपुरोहित जाति का इतिहास भाग 1 
इस बुक में कन्नौज से लेकर जोधपुर रियासत के राजपुरोहितो की भुमिका इस बुक को मैं 1998 से पढ़ रहा हूं 
2. राजपुरोहित जाति का इतिहास भाग 2 
इस बुक में राव जोधा जी के पुत्र बीका जी और
सेवड़ राजपुरोहित दामों जी के पुत्र बीका जी 
राव बीका जी ने बीकानेर राज्य की स्थापना की इसमें सेवड़ राजपुरोहित बीका जी की मुख्या भुमिका रही और
उनके वंशजों का इतिहास इस बुक में है 
इस बुक को हाल ही में लॉन्च किया गया है जो मैने पढ़ ली एक साल से 
3. पाली का इतिहास
इस बुक में पालीवालो का इतिहास और अन्य राजपुरोहितो का इतिहास है इस बुक को 5 साल से पढ़ रहा हूं।
 
4. राजपुरोहितो का राजस्थान के राजपरिवारो से संबंध 
इस बुक में सेवड़ राजपुरोहित सूरजमल सिंह जी अखेराजोत फोटो भी उनका ही है उनका पूरा इतिहास इस बुक में दर्ज है केवल इन पर ही पुरी बुक है जिसमे 200 खलिता रुका पत्रों का अनुवाद है जिससे पता चलता है कि राजपुरोहित समाज की क्या भुमिका रहती थी रियासत काल में 
यह बुक भी मैं 5 साल से पढ़ रहा हूं


5. धरोहर :  इस बुक में मूलराज जी के सम्पूर्ण परिवार का इतिहास है जिसमे सभी मूलराजोत और अखेराजोत शूरवीरों का इतिहास है इस बुक को करीब ४ साल तक पढ़ा

6. केसरी सिंह जी का जसप्रकास: इस बुक में सेवड़ राजपुरोहित वीर केसरीसिंह जी का इतिहास लिखा है
अहमदाबाद युद्ध में उनकी भूमिका 
यह बुक मुझे नहीं मिल पाई हमेशा आउट ऑफ स्टोक रही 
 

पता : 
यह सभी किताबे आपको ऑनलाइन मिल जाएगी 
जोधपुर में राजस्थानी ग्रंथागार  प्रथम माला 
सोजती गेट जोधपुर 
 0291~ 2657531, 2623933
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Website: www.rgbooks.net 

 यह जानकारी मैने इतिहास में रुचि रखने वाले युवाओं
के लिए दी है जो रोज पूछते हैं कि किताबे कहा मिलेगी
और खास कर मेरे ब्राह्मण मित्र जो राजस्थान से बाहर के है यूपी बिहार एमपी बंगाल गुजरात और महाराष्ट्र से जुड़े हुए हैं उनको राजपुरोहित समाज का इतिहास जानने की काफी रुचि रखते हैं उनको सही से पता नहीं है कि राजपुरोहित समाज क्या है क्या भुमिका रहती थी और क्या इतिहास रहा है इसलिए अब आप यह बुक मंगाकर खुद पढ़ो  और समझो
                  
             आपका शुभचिंतक 
           महेन्द्र सिंह मूलराजो गांव ढण्ढोरा हाल चेन्नई
    9840654779

7.4.22

राजपुरोहित राज ऋषि श्री सोमायत जी मुथा

महान ऋषि पीपलाद की वंश परंपरा में पालीवालों के जिनके पास पाली, नाडोल क्षेत्र के आस पास की 84 गांवों की जागीरी थीं| उस समय के वे बहुत बड़े जागीरदार हुआ करते थे थै , पालीवाल पाली के संपन्न शासक थै।
पालीवाल शक्ति की उपासना करते थै,
मां शक्ति के आदेशानुसार ही पालीवालों ने सारी जागीरी  
राव लाखण जी चौहान को सुपुर्द कर दी, राव लाखण ने मुगलों और लुटेरी जातियों का खात्मा कर क्षेत्र में शांति स्थापित की
इन्ही पालीवालो के वंशज सोमायतजी जालौर के शासक राव कान्हड़ देव के दरबार में उपस्थित हुए| वहा उनको बड़ा आदर सत्कार मिला 
तथा सोमायत जी को दीवानी मेहता पद पर सुशोभित किया
साथ ही श्री गुरु की पदवी तथा व्यास की पदवी भी दी
कान्हड़ देव के दरबार में सबसे बड़े अधिकारियों में सोमायत जी का स्थान अग्रणी था
वीर कान्हड़देव ने सोमायत जी को एक उच्च श्रेणी का नीला अश्व भी भेट किया

राव कान्हड़ देव के पुत्र राव वीरमदेव और खिलजी के उस भीषण युद्ध में सोमायत जी मुथा बड़े प्रराक्रम से लड़े 
सोमायत जी ने अपनी अलौकिक सूझबूझ, राजनैतिक सलाह और शौर्य का अद्भुत परिचय दिया
इस भीषण युद्ध में सोमायत जी की तलवार से दुश्मनों के संहार से धरती को रक्त लाल कर दिया 
अंत में वीरगति को प्राप्त हुए   


जालौर दुर्ग में आज भी सोमायत जी का स्मारक शान से भग्न रूप में स्थापित है , जो वर्तमान में वहा एक मज्जिद के समीप धड़े पर विद्यमान हैं उस समय के कवियों ने सोमायत जी के युद्ध का वर्णन कुछ इस प्रकार किया की।

सम्वत तरह सौ अडसठे, विराम दे री वार।
सोनगरो ने सोमाँयत,जळहर हुआ जुहार।
शीश भटो रा काटिया, हाळी अजब हिलोर।
सूरापण छानो नहीं, जग चावो जाळोर।
ख़िलजी री खगोह,झाटो झेली जोम सु। 
रंग दियो वागोह, धिन सोमाँयत सुरमा


वीर विरमदेव के पुत्र राव लक्ष्मण जी ने इनकी शुरवीरता से प्रभावित होकर सोमायत जी के वंशजों को 6 गांवो के साथ 11अन्य इनाम प्रदान किए 
रुंगडी, घेेनडी, पिलोवनी, वनदार, शिवतलाब, सेवास
सेवास गांव की जागिरी कुछ समय बाद जब्त कर दी गईं थी

इन्ही मुथाओं के भाइयों ने मेवाड़ राजघराने में भी अपनी शुरवीरता का लोहा मनवाया तब मेवाड़ के राज दरबारी कवियों ने भी इनके सम्मान में लिखा

मुथा मोटी मरजाद,राजपुरोहित रुडा
महाराणा मोकळ्या, सिरोपांव काड
मुथो राजप्रोहित मारिजियो, राणा भाया राड
सगतसि ऊ सोगन सटे, मुथा तजि मेवाड़
समपडत कीधी सगतीया, बढ़ र बीजल बाढ़।
पोरष राणा, प्रताप रो राजप्रोहित मुथो प्रगाढ़।

इन महापुरुषों के वंशजों से मेरा निवेदन है की शीघ्र ही महान शूरवीर श्री सोमायत जी मुथा की अश्व असवार एक अष्ठ धातु की प्रतिमां स्थापित कर इन्हे उचित सम्मान दिलावे

✍️ बलवीर सिंह बिकरलाई

स्रोत:- कान्हड़ देव प्रबधन संग्रहण से प्राप्त जानकारी "राजपुरोहित जाती का इतिहास भाग 1" में दर्ज है 

चित्र सूची 
1:- महान वीर वीरमदेव सोनिगरा
2:-राव लाखण अथवा राव लाखा चौहांन
3:- जालौर के अजेय दुर्ग का मुख्य द्वार
4:- अजेय जालौर दुर्ग का विहंगम दृश्य
5:- भीषण युद्ध का चित्रण

30.7.21

राजगुरु परिवारो का गांव का वितरण

 राजपुरोहित राजगुरु परिवारो का गांव का वितरण हो सकता है इसमें कहीं गांव के नाम छूट गया है अगर ऐसा आपको भी लगता है तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए गा हम उन्हें अपडेट करने की पूरी कोशिश करेंगे
राजगुरू परिवार🙏🏻जुलाई 2021 तक गाँवो का विवरण 



    💐बाड़मेर जिला💐
1. बालेरा(बाड़मेर)
2. रड़वा(बाड़मेर)
3. लंगेरा (बाड़मेर)
4. सिलोर (समदड़ी)
5. बालासर(शिव)
6. बिसु खुर्द (शिव)
7. गेंहू (बाड़मेर)
8. गुड़ानाल(सिवाना)
9 . राजगुरो की ढाणी (कोरणा बालोतरा)
10. डेरीया (बालोतरा)
11. बरियाडा (शिव )
12. राजडाल (शिव)
13. पुषड़ (शिव)
14. साता (बाखासर   )
15. बावड़ी (चोहटन)
16. चोहटन (बाड़मेर)
17. सरूपनगर धारवी (बाड़मेर )
18. लिलसर (धोरिमना)
19. धनवा(सिणधरी)
20. अराबा(बाड़मेर)
21. डोली
22. रमणीया(बाड़मेर)
23. खारवा  (बाड़मेर )
24. कोटड़ा (बाड़मेर)
25. पादरू(बाड़मेर)
26. रेवाड़ा सोडा (बाड़मेर)
27. पटाऊ(बाड़मेर)
28. लूदराड़ा(बाड़मेर)
29. आकली(शिव)
30. राजपुरा थोब (बालोतरा)


  💐सिरोही जिला💐
1. अजारी (सिरोही)
2. पिंडवाड़ा (सिरोही)
3. कांटल   (सिरोही)
4. ऊंदरा  (सिरोही)
5. आदर्श  (सिरोही)
6.असावा(सिरोही)
7. सनवाड़ा(सिरोही)
8. वाण(सिरोही)
9. धानदपुर(सिरोही)
10. खडात (आबुरोड )
11. मनोरा
12. ओर (आबुरोड )
13. जावाल (सिरोही)
14. बावली  (सिरोही)
15. चडुआल  सिरोही
16. आमलारी  (सनपुर)
17. मनादर(सिरोही)
18. झाडोलीवीर (सिरोही)
19. पोसिन्त्रा (आबुगोड) 
20. कैलाशनगर (सिरोही)
21. बरलूट (सिरोही)
22. सनपुर (सिरोही)
23. सेलवाडा (सिरोही)
24. निंबज (सिरोही)
25. फुंगणी (सिरोही)
26. धाण (रेवदर)


  💐जालोर जिला💐
1. सजारा ( सांचोर )
2. लैदरमैर (भिनमाल)
3. भीनमाल (जालोर)
4. घासेड़ी(जालोर)
5. पोसपादरा (भीनमाल)
6. सेवाड़ा (रानीवाडा)
7. रोलड़ा/रोडला (आहोर)
8. हिडवाडा (सांचोर) 
9. चितलवाना (सांचोर)
10. रणोदर (सांचोर)
11. झोटडा (सांचोर) 
12. सिवाडा (सांचोर)
13. डेडवा (सांचोर)
14. सांचोर (सांचोर)
15. धमाणा (सांचोर)
16. विछावाडी (सांचोर)
17. जोडादर (सांचोर)
18. भवातडा (सांचोर)
19. सूराचद (सांचोर)
20. रतनपुरा (सांचोर)
21. नवापरा (सांचोर)
22. देवडा  (सांचोर)
23. सुराणा (जालोर)
24. टीलोड़ा (जालोर)
25. चोराउ (जालोर)
26. भीनमाल (जालोर)
27. गुडा मालानी (जालोर)
28. सेवाड़ा (रानीवाडा)
29. तातडा (सांचोर)
30. भादरुणा (सांचोर)
31. जेतपुर (रानीवाड़ा)
32. बावतरा
33. डुडसी
34. थांवला(आहोर)
35. रायपुरिया(जालोर)
36. गोलाना (जालोर)
37. आमली (सांचोर)
38. जड़ीआ जनाली (सांचोर)
39. ओड़वाड़ा (जालोर )
40. हरजी (जालोर
41. दातिवास (भिनमाल)
42. पमाणा (भिनमाल)
43. कोडका  (भिनमाल)



  💐जोधपुर जिला💐
1. बुड़किया
2. बासनी
3. फिच (लुणी)
4. बिलाड़ा(जोधपुर)
5. गादेरी
6. मालकोसनी (बिलाड़ा)
7. बारां (जोधपुर)
8. रूदिया(जोधपुर)
9. सिलारी (जोधपुर)
10. उटाम्बर (जोधपुर)
11. भांप (फलोदी )
12. मोरिया(जोधपुर)
13..भूंगरा(जोधपुर)
14. ख़िरजा(जोधपुर)
15. थोब ओसिया(जोधपुर)
16. नेवरा (जोधपुर) 
17. लुणी  (जोधपुर)
18. बाला सतीजी गाँव  (बिलाङा)
19. जैतीवास (बिलाडा)


    💐पाली जिला💐
1. श्रीसेला (बाली )
2. बीजापुर(बाली)
3. गिराली (बाली)
4. पराखिया (सुमेरपुर)
5. पुराडा (सुमेरपुर)
6. खेरवा (पाली)
7. पिचावा (सुमेरपुर)
8. पावा (सुमेरपुर)
9. खुडाला (बाली)
10. धणा (सुमेरपुर)
11. धोलेरीया (जैतारण)
12. बोया (बाली)
13. चांचौड़ी(देसुरी)
14. भिटवाड़ा (बाली)
15. दयालपुरा(पाली)
16. मोकमजी गुड़ा(पाली)
17. ढोला (पाली)
18. चांडवास(पाली)
19. जैतारण(पाली)
20. गादाना वोरा (राणावास)
21. दुजाणा (सुमेरपुर)
22. आउवा (मारवाड़ जंक्शन)
23. सांडेराव (सुमेरपुर)
24. चंडावल 
25. चिराना
26. ईसाली 
27. नादाणा भाटान (रानी)


   💐नागौर जिला💐
1. भाखरोद (नागौर)
2. आछोचाई  (नागौर)
3. सँखवास (नागौर)
4. रेण  (नागौर)
5.  गोठडा (मुन्डवा नागौर)


  💐बीकानेर जिला💐
1. किसनासर(बीकानेर)
2. कानासर(बीकानेर
3. शिवनगर (बीकानेर)
4. गुणेशवाली (बीकानेर) 
5. छेला  (बीकानेर )


   💐चूरू जिला💐
1. कोलासर (चुरू)
2. सुजासर
3. जालेऊ (रतनगढ़)


    💐जैसलमेर जिला💐
1. बाँकलसर (मोहनगढ)
2. महादेव नगर(मोहनगढ़)
3. फतेहगढ़ (जैसलमेर)


    💐हनुमानगढ़💐
1.हनुमानगढ़ जिला एवम सिमावर्ती राजपुरोहित समाज 🙏🙏

1 हनुमानगढ़ -  राजगुरु
2  पीलीबंगा - राजगुरु
3  नोहर - राजगुरु
4  रावतसर - राजगुरु
5 भहलोलनगर - राजगुरु
6 रताखेड़ा - राजगुरु
 7 हरिपुरा -  राजगुरु,


    💐गुजरात राज्य💐
1.सनवाल (थराद)
2. वासना लाखनी (डिसा)
3. सेडला (थराद)
4. विजयनगर (राधनपुर)
5. अर्जुनशर  ( राधनपुर)
6. भोडालीया  (भाभर)
7. डिसा  (गुजरात)
8. नवानगर (गुजरात)
9. कपुरासी (गुजरात)
10. थराद(गुजरात)
11. भुज(गुजरात)
12.अलवाड़ा(बनासकांठा)
13.जाट(बनासकांठा)
14.धणोधर(बनासकांठा)
15.भडली(बनासकांठा)
16. रवि (धानेरा)
17. सोडा (धानेरा)
18. भाडोत्रा (धानेरा)
19. रतनपुरा 


    💐पाकिस्तान💐
1.डुंगरी 
2. मीठी 
3. सलामकोट 
4. नगरपारकर 
5. देपयार

26.2.21

श्रीमती सुनीता कंवर राजपुरोहित के प्रधान निर्वाचित होने के बाद प्रथम बार किशनगढ़ आगमन पर भव्य स्वागत

श्रीमती सुनिता कंवर राजपुरोहित के पंचायत समिति रोहट (पाली) के प्रधान निर्वाचित होने के बाद प्रथम बार किशनगढ़ आगमन पर उनके पीहर में श्री रामेश्वरसिंह जी राजपुरोहित के यंहा आयोजित स्वागत समारोह में कांग्रेस नेता महावीरसिंह जी राजपुरोहित सुकरलाई, रोहट के पंचायत समिति सदस्य एवं पाली के कांग्रेस नेताओ, समाजबंधुओं ने शिरकत की।



इस दौरान पूर्व विधायक नाथूराम जी सिनोदिया,किशनगढ़ उपखण्ड अधिकारी राजेन्द्रसिंह जी सिसोदिया, डिप्टी गोपालसिंह जी भाटी,रोहट उप प्रधान कानाराम जी पटेल,सेवादल जिलाध्यक्ष  मोहन जी हटेला,पूर्व जिला प्रमुख प्रत्याशी जोगाराम जी सोलंकी, लोक अभियोजक श्री चन्द्रभानु जी राजपुरोहित,जिला महासचिव जीवराज जी बोराणा,पूर्व शहर अध्यक्ष प्रकाश जी सांखला, पूर्व जिला परिषद सदस्य अमराराम जी पटेल, पार्षद अमीन अली जी रंगरेज,पूर्व पार्षद जयसिंह जी राजपुरोहित,पंचायत समिति सदस्य लक्ष्मणराम भूरिया, डूंगाराम जी सीरवी, पुनाराम जी देवासी, गणपत जी चौधरी, रमेश जी पटेल, सोहनलाल जी गुणपाल,  वागाराम जी विश्नोई, बाबूसिंह जी वायद, सरपंच अमराराम जी बेनीवाल, दिलदार खान जी, जोगसिंह जी बिठू, अर्जुनसिंह जी जेतपुर,सरपंच राजेश जी राजपुरोहित, नरेन्द्रसिंह सुकरलाई,गोपाल जी बिश्नोई,सहित सैकड़ो समाजबंधु उपस्थित रहे।




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9.8.20

राव सीहा के पुत्र राव आस्थान ने गोहिलों व डाभियों को हराकर खेड़ जीत लिया.

● साफा और मारवाड़ के राठौड़ ●

राव सीहा के पुत्र राव आस्थान ने गोहिलों व डाभियों को हराकर खेड़ जीत लिया और कालान्तर में जब उसके प्रपौत्र राव कनपाल(१३१३-१३२३ई.) के समय महेवे का सारा भू-भाग राठौड़ों के अधिकार में आ गया। तब से राठौड़ों की सीमा जैसलमेर को छूने लगी। जिससे भाटियों-राठौड़ों के बीच समय-समय पर झगड़े होने लगे। तब कनपाल के ज्येष्ठ पुत्र भीम ने भाटियों को हराकर काक नदी से पश्चिम की ओर धकेल दिया। तब से दोनों की सरहद नियत हो गई। जिसका ये सोरठा प्रसिद्ध है-

"राव सीहा की देवली" व "अभिलेख"

 आधी धरती भीम, आधी लोदरवै धणी।

 काक नदी छै सीम, राठौड़ां ने भाटियाँ।।

 [आधी धरती भीम की और आधी धरती लौद्रवै के शासकों(भाटियों) की है, काक नदी भाटियों व राठौडों के राज्य की सीमा रेखा है]

चूँकि ये सीमा महेवे के शासकों ने बलपूर्वक तय की थी, अत: भाटियों ने इसे नहीं माना और वे राठौड़ों के विरूद्ध मुल्तान के मुसलमानों व अमरकोट के सोढों को ले आए। 

ई.1323 में इनके मध्य हुए युद्धों मे पहले भीम व बाद में राव कनपाल दोनों ही लड़कर काम आए और कनपाल का दूसरा पुत्र जालणसीं (१३२३-१३२७) अब महेवे का नया शासक बना।

अमरकोट के सोढा भाटियों का साथ देने से अब राठौड़ों के नये दुश्मन बन गये और ये लोग भी यदा-कदा महेवे के गाँवों को लूटने लगे।

इन्हीं दिनों राव जालणसीं ने एक वृक्ष विशेष को 'अमर' घोषित कर दिया और इसके फल-फूल, पत्तियाँ-टहनी इत्यादि काटने पर प्रतिबंध लगा दिया। 'जोधपुर राज्य की ख्यात' के अनुसार ये वृक्ष "चाँदणी" नामक गाँव में था। ये वृक्ष कौनसा था इसके प्रमाण नहीं मिलते।

सोढा राजपूतों को जब इस वृक्ष का पता चला तो उन्होंने राव जालणसीं को चिढाने के लिये इस वृक्ष को मसखरी में काट दिया। जिससे राठौड़ों और सोढों में युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान सोढों के सरदार दुर्जनशाल के सिर का साफा राव जालणसीं ने छीन लिया। राव जालणसीं विजयी हुआ।

विजय की याद के उपलक्ष्य में राठौड़ों ने साफा पहनना शुरु कर दिया। कहीं-कहीं ख्यातों में लिखा है राठौड़ों ने तब से विजय स्वरूप साफे को कानों तक पहनना शुरु कर दिया। परंतु ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ से पता चलता है कि राठौड़ इस घटना से पूर्व लगभग १३२३ ई. से तक तो साफा या पगड़ी नहीं पहनते थे।

राव सीहा के पाली के बाँगड़ म्यूजियम स्थित देवली से पता चलता है कि राव सीहा के सिर पर कोई पगड़ी या साफा या मुकुट नहीं है। मूर्ति में उनके घुँघराले बाल दिखाई देते हैं जो बँधे हुए हैं। सीहा के आगे एक सती हाथ जोड़े व पैरों में एक मनुष्य पड़ा है।  इस स्मारक के नीचे का अभिलेख १२७३ ई. का है। इससे भी राठौड़ शासकों के तब तक साफा नहीं पहनने के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं। 

ये शोध का विषय है क्योंकि राजवी लोग उस समय की परंपरा अनुसार सिर पर कुछ न कुछ तो अवश्य धारण करते होंगे। या हो सकता है राठौड़ शासक कुछ नहीं भी धराण करते हों। राव जालणसीं इत्यादि के समकालीन वीर पाबूजी अपनी एक ओर झुकी हुई पाग के लिये प्रसिद्ध रहे हैं। किंतु पाबूजी के देवलोक का समय क्या रहा, इस पर विद्वानों में मतभेद पाया जाता है।

संलग्न चित्र:

"राव सीहा की देवली" व "अभिलेख" (हालांकि सिर धुँधला दिख रहा है, पर नग्न है)

सन्दर्भ ग्रंथ 

१.जोधपुर राज्य की ख्यात   २. मारवाड़ का इतिहास- पं. विश्वेश्वरनाथ रेऊ  ३. मुहणोत नैणसीं की ख्यात

 भेजने वाले लेखक श्री दिनेशपाल सिंह बीसूकलां 

http://sawaiagra.blogspot.com/2018/06/blog-post.html


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News स्पॉन्सर By:-  हेम्स एजुकेशन बोर्ड राजस्थान 



22.9.19

पांचलोड़ का इतिहास जो रमणीया से आये थे

ये है तेजोजी पांचलोड़ का इतिहास जो रमणीया से आये थे 

        जोधपुर के पश्चिमी उत्तर दिशा में 30 किलोमीटर दूर है चावण्डा गाँव। यहां पर राव की चौपाईयोँ ओर गांव के इतिहास अनुसार लांछा देवी पुरोहित पहाड़ी पर देवी माँ की पूजा उपासना करती थी। देवी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि जब भी आप याद करोगे मैं हाजिर हो जाऊंगी। राव सीहा के वंशज वीरमदेव के पुत्र और प्रथम प्रतापी शासक चुंडा जी राठौड़ बाड़ी की पहाड़ियों में यहाँ वहां घूम रहे थे।यहां पर जब एक कन्या को इस तरह चावण्डा पहाड़ी पर देवी के मंदिर में भक्ति करते हुए देखा। तो उन्होंने कहा की माँ से पूछना की राव चुंडा के जीवन में राजपाठ लिखा हुआ है।लाछा बाई ने कहा कि मैं आपके बारे में माता जी से बात करूंगी। लाछा बाई ने मां भवानी की अराधना कर पूछा मां एक राठौड़ कुल का नौजवान यहां भटक रहा है ।

       चामुंडा देवी ने कहां की है बेटी चुंडा जी राठौड़ का राज सुख लिखा हुआ है। जैसा मैं कहूंगा वैसा करोगी तो राजपाट भी होगा। उसी कथन के अनुसार राव चुंडा जी ने किया जिन्होंने मंडोर दुर्ग को मांडू के सूबेदार से जीतकर अपनी राजधानी बनाया था।चुंडा जी राठौड़ ने राजा बनने के बाद लाछा बाई को 4 गांव पीहर पक्ष को और चार गांव ससुराल पक्ष को जागीरी के रूप में दिए जिनमें से यह चावण्डा गांव भी हैं जहां के पांचलोड तेजाजी के साथ लाछो बाई का विवाह हुआ। आज चावण्डा गांव के राजपुरोहित मां चामुण्डा के कारण चावण्डिया कहलाने लगे।।
   प्रेमलजी पाचलोड़ र दुहा में वर्णन // मेंमद गोरी ने मारियो सजन भायल रे संग लाख पसाव रो दोन दियो प्रेमल पाँचलोड ने रंग ।। गज मोणक। घोड़ा अपे सोना तणो सिरपाल एकण हाथ समापियो प्रेमल लाख पसाव ।। अम्बाड़ी समेत हस्ती अपे मोहरों तीन सौ सार प्रेमलदिनी पाँचलोड जणे हीरो मण्डोणी हार ।। पाँचलोड़ पारा रूसी वीरम वंश विचार प्रेमल तणे पिरवार। ने देवो रंग दातार ।। जोधा जी ने जब जोधपुर नगर बसाया तो अपनी कुलदेवी मां चामुंडा जी का मंदिर मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थापित किया। जो आज विश्व विख्यात है।

        राजस्थान की भव्यता का प्रतीक जोधपुर शहर अपनी बेमिसाल हवेलियों की भवन निर्माण कला,मूर्ति कला तथा वास्तु शैली के लिए दूर-दूर तक विख्यात है। इसी शहर के लगभग 400 फुट ऊंचे शैल के पठार पर स्थित है, भारत के सबसे विशाल किलों में से एक मेहरानगढ़ का भव्य किला।
किले की छत पर विराजमान यह मंदिर अपनी मूर्ति कला तथा उत्तम भवन निर्माण कला की एक अनूठी मिसाल है, जहां से सारे शहर का विहंगम दृश्य साफ नजर आता है। मेहरानगढ़ किले में प्रवेश मार्ग से सूर्य की आभा का आभास देते श्री चामुंडा देवी मंदिर में प्रवेश करने का मार्ग आसपास बनी आकर्षक मूर्तियों से सुसज्जित है। मंदिर में स्थापित मां भवानी की मूर्ति मगन बैठी मुद्रा की बजाय चलने की मुद्रा में नजर आती है। मां चामुंडा देवी को अब से करीब 550 साल पहले मंडोर के परिहारों की कुल देवी के रूप में पूजा जाता था |इस किले में एक भव्यता का प्रतीक मां जगदम्बा चामुंडा का मंदिर भी स्थित है, जो किले के दक्षिणी भाग में सबसे ऊंची प्राचीर पर स्थित है। श्री चामुंडा देवी का यह मंदिर जोधपुर राज परिवार का इष्ट देवी मंदिर तो है ही, बल्कि लगभग सारा जोधपुर ही इस मंदिर की देवी को अपनी इष्ट अथवा कुल देवी मानता है।

                               इतिहास
       इस मंदिर में देवी की मूर्ति 1460 ई. में चामुंडा देवी के एक परमभक्त मंडोर के तत्कालीन राजपूत शासक राव चुंडा के पुत्र राव जोधा द्वारा अपनी नवनिर्मित राजधानी जोधपुर में बनाए गए किले में ही स्थापित की गई। पहले मां चामुंडा को जोधपुर और आस-पास के लोग ही मानते थे और इनकी पूजा अर्चना किया करते थे |

    लेकिन मां चामुंडा में लोगों का विश्वास 1965 के युद्ध के बाद बढ़ता चला गया |
     लोगों की आस्था बढ़ने के पीछे की वजह के बारे में कहा जाता है कि जब 1965 का युद्ध हुआ था, तब सबसे पहले जोधपुर को टारगेट बनाया गया था और मां चामुंडा ने चील के रूप में प्रकट होकर जोधपुरवासियों की जान बचाई थी और किसी भी तरह का कोई नुकसान जोधपुर को नहीं होने दिया था | तब से जोधपुर वासियों में मां चामुंडा के प्रति अटूट विश्वास है |
         मंदिर के पुजारी ने कहा कि मां चामुंडा का परचम इतना लहराया है कि आज जोधपुर से बाहर शायद ही कोई ऐसा गांव या शहर ऐसा होगा, जहां मां चामुंडा को लोग नहीं मानते और जानते हों | इसी वजह से देश और विदेश की जानी मानी हस्तियां जोधपुर में आकर अपने मांगलिक कार्य पूरे करते है |

  पीहर और ससुराल के पक्ष में चार चार गांव कौन से हैं उनके नाम इस प्रकार है
     पीहर पक्ष के बम्बोर, भाटेलाई, हिंगोलो,नेहड़ली, 
     ससुराल पक्ष के चावण्डा,भैसेर,इटावा,झाड़ासनी,

जानकारी देने के लिए श्री मदनसिंह चावण्डा (मरूधर भारती न्यूज़ ) का धन्यवाद 

5.8.18

राजपुरोहित को जानना चाहते हो? मैं आपको बताता हूँ कि राजपुरोहित कौन है...अभय सिंह जसोल


राजपुरोहित को जानना चाहते हो? मैं आपको बताता हूँ कि राजपुरोहित कौन है।

राजपुरोहित वह है जो वशिष्ठ के रूप में केवल अपना एक दंड जमीन में गाड़ देता है,जिससे विश्वामित्र के समस्त अस्त्र शस्त्र चूर हो जाते हैं और विश्वामित्र लज्जित होकर कह पड़ते हैं-
धिक बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलं बलं।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्वस्त्राणि हतानि में।
(क्षत्रिय के बल को धिक्कार है। राजपुरोहित का तेज ही असली बल है। राजपुरोहित वशिष्ठ का एक ब्रह्म दंड मेरे समस्त अस्त्र शस्त्र को निर्वीर्य कर दिया)

राजपुरोहिता वह है जो परशुराम के रूप में एक बार नहीं,21 बार आततायी राजाओं का संहार करता है।जिसके लिए भगवान राम भी कहते हैं-

विप्र वंश करि यह प्रभुताई।
अभय होहुँ जो तुम्हहिं डेराई।
जिनके विषय मे यह श्लोक प्रसिद्ध है-

अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।

चार वेद मौखिक हैं अर्थात् पूर्ण ज्ञान है एवं पीठपर धनुष-बाण है, अर्थात् शौर्य है,अर्थात् यहां ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं । जो कोई इनका विरोध करेगा, उसे शाप देकर अथवा बाणसे परशुराम पराजित करेंगे । ऐसी उनकी विशेषता है ।
राजपुरोहिता वह है,जो दधीचि के रूप में अपनी हड्डियों से बज्र बनवाकर,वृत्तासुर का अंत कराता है।जब तक धरती है,इतिहास मिट नहीं सकता

राजपुरोहित वह है,जो चाणक्य के रूप में,अपना अपमान होने पर धनानन्द को चुनौती देकर कहता है कि अब यह शिखा तभी बँधेगी जब तुम्हारा  नाश कर दूंगा और ऐसा करके ही शिखा बाँधता है।

राजपुरोहित वह है जो अर्थ शास्त्र की ऐसी पुस्तक देता है,जो आज तक अद्वितीय है।

राजपुरोहित वह है जो पुष्य मित्र शुंग के रूप में मौर्य वंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ को ,उठाता है तलवार और स्वाहा कर देता है।भारत को बौद्ध होने से बचा लेता है।यवन आक्रमण की ऐसी की तैसी कर देत ब्राह्मण है
राजपुरोहित वो है जिसने महाराणा प्रताप व उनके भाई शक्ति सिंह के मध्य युद्ध को रोकने के लिए,उनके समक्ष चाकू से अपनी ही हत्या कर दिया था।पता नहीं है तो श्याम नारायन पांडेय का महाकाव्य हल्दी घाटी,प्रथम सर्ग की ये पंक्तियां पढ़ो-

उठा लिया विकराल छुरा 
सीने में मारा राजपुरोहित ने। 
उन दोनों के बीच बहा दी 
शोणित–धारा ब्राह्मण ने।।

वन का तन रँग दिया रूधिर से 
दिखा दिया¸ है त्याग यही। 
निज स्वामी के प्राणों की 
रक्षा का है अनुराग यही॥ 

राजपुरोहित था वह राजपुरोहित था¸ 
हित राजवंश का सदा किया। 

राजपुरोहित ही थे वो द्रोणाचार्य जिनके कोप और क्रोध से बचने के लिए स्वयं ब्रह्माजी ओर भगवान श्री कृष्णा को भी वचन और कपट से उनसे ब्रह्मास्त्र का प्रयोग नही करने दिया।

     आप उन महान पुर्वजो की संतान हो काल भी आपसे भयभीत रहेगा अगर आप अपने राजपुरोहितान धर्म का पालन करोगे।

इसलिए मेरे समाज के युवा भाइयो आप अपने इतिहास शौर्यता संस्कार के हिसाब से रहो लोग आपको स्वयम राष्ट्रगुरु की नजरो से देखेंगे।

और अधिक जानकारी चाहिए तो मेरे इनबॉक्स में मेसेज करना।

अभय सिंह राजपुरोहित जसोल


19.6.18

सुमेरपुर के लौह पुरुष स्वतंत्र सेनानी वीर बाबूलालजी राज्यगुरु !

सुमेरपुर के लौह पुरुष स्वातंत्र्य #वीर बाबूलालजी राज्यगुरु !

जननी जने तो ऐसा जने के दाता के सुर।
नि तो रीजे बाँझडी तू मत गवा जे नूर।।
#पर्व है पुरुषार्थ का, दीप के दिव्यार्थ का🚩🔥

#स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी, सुमेरपुर के प्रथम #सरपंच, राजपुरोहित समाज की आन बान शान , 36 कॉम के सारथी लोकनायक श्री बाबुलालजी राजगुरू जी की #पुण्यतिथि पर सादर नमन. सुमेरपुर के इतिहास में राजगुरू जी एक ऐसे जन नायक के रूप में पहचाने जाते हैं जिन्होंने अपने #क्रांतिकारी चिंतन से सर्व समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सुमेरपुर के, सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया।
जन्म - सन 1911 पलासिया खुर्द(जालोर)
मृत्यु- 19/06/1962 ऊंदरी(सुमेरपुर)

सुमेरपुर के लोहपुरुष श्री बाबूलाल राजगुरु सन 1936 में इन्होंने सुमेरपुर की एक जिनिंग फैक्ट्री में हो रहे मजदूरों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और मजदूरों का संगठन एक आंदोलन खड़ा कर दिया पर उस जमाने में पुलिस और हुकूमत तो मालिकों के हाथ थी मजदूरों का कोई रक्षक था ही नहीं फलस्वरुप राजगुरु जी पर झूठे मुकदमे लगाकर उन्हें जेल की सजा भुगतनी पड़ी इसके बाद सुमेरपुर की सीमा से लगे सिरोही राज्य के शिवगंज कस्बे के निवासी श्री देवी चंद सागरमल के माध्यम से राजू गुरुजी का संपर्क सिरोही प्रजामंडल प्रमुख नेता श्री गोकुल भाई भट्ट से हुआ श्री गोकुल भाई के साथ उन्होंने सिरोही राज्य के गांव की जागरी जुल्मों के विरुद्ध आवाज उठाई उनके प्रचार ने संगठन में अपूर्व शक्ति पैदा की बाद में राज्य से निष्कासित कर दिया गया जागीरदारों से प्रभावित सामने पुलिस ने सन 1943 मैं इन्हें लोगों में बगावत करने का आरोप लगाकर हिस्ट्रीशीटर की सूची में दर्ज किया लगातार थाने में बुलाकर डराते धमकाते हैं तथा एक बार उनको झूठा फंसा कर जेल में डलवा दिया जिस पर उन्होंने महाराजा उम्मेद सिंह को कविता लिखकर न्याय की गुहार लगाई 51 वर्ष की अल्प आयु में पाली जिले के जागीरदारों भ्रष्ट सरकारी मुलजिमों मुनाफाखोरों व्यापारियों एवं गरीब जनता के शोषण के खिलाफ संघर्ष करते हुए जनता को पूर्ण रुप से स्वतंत्रता दिलाकर दिनांक 19 6 1962 में अस्त हो गया किंतु आज भी सुमेरपुर की जनता उनका नाम सुनकर सम्मान मैं सर झुका देती है बचपन का बहुत ही गरीब परिवार में गुजरा गांव गांव जाकर किताबें बेची साधनों के अभाव में नंगे पैरों यात्रा करके अपने जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाएं सके और वह सहारा उन्हें पत्रकारिता के रूप में मिला|!

जाने कैसे लोग थे जो देश हित के बारे में सोचते थे आज तो हर आदमी खुद के स्वार्थ में ही लगा है।
नमन उन महान लोगो को जो वाकई महान थे सिर्फ मीडिया या जनता को दिखाने के लिये देशहित का ड्रामा नही करते।

लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य-लेखे, विजय के उद्घोष! गीता के कथन!
आपको सत सत नमन है! 🙏💐
#महादेव🚩
🙏राजगुरु साहब अमर रहे🙏


7.10.17

राजपुरोहित का मूल आधार सदाचरण और नैतिकता

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8.9.17

Patlisar Purohitan के बारे जानकारी

यह शिल्लालेख पातलीसर में पुराने कुवे के पास लगा हुआ है।
इस पर कुछ लिखा है जो स्पष्ट दिखाई नहीं देता है, ऊपर की दो लाइन में कुछ-कुछ समझ आता है ,,
जो शायद गांव की स्थापना की सन् है वो है विक्रम सम्वत् १३२८(1328) वर्ष बसा, निचे की लाइन इस प्रकार है

सरिता, गणेशराम आगे कुछ दिखाई नहीं देता है,
क्योंकि मनुष्य के क्रूर हाथों ने इस शिल्लालेख से अपने औजारो की धार बनाने के घर्षण करके मिटा दिया है,
जिससे गांव के इतिहास का कोई पता नहीं चल पाया है,
किसी ने कहा है की इस गांव की स्थापना कोई पातूराम  नाम के व्यक्ति ने की थी ।। सही जानकारी आज कही नहीं मिल रही है।

पातलीसर पुरोहितान


31.5.17

रासीसर गांव के सेवड़ राजपुरोहितों का इतिहास वीर-गाथा

सवत् 1797 मे मात्र 22 वर्ष की आयु में जोधपुर रियासत के महाराजा श्री अभय सिंह जी ने विद्रोही सरदारों के साथ मिलकर बीकानेर रियासत पर आक्रमण कर दिया। फलस्वरूप महाराजा जोरावर सिंह जी एव उनके कुंवर गजे सिंह जी को सेना सहित बीकानेर के किले जूनागढ़ में ही घेर लिया गया।इस विकट स्थिति में वीर सेनापति एव रणबांकुरे श्री जगराम सिंह जी राजपुरोहित ने अपनी वीरता का कौशल दिखाया और विरोधी सेना को नागौर तक खदेड़ कर ⚔लहू-लुहान ⚔🚩स्थिति में विजय श्री का संदेश महाराजा सा को देकर नश्वर-शरीर त्याग दिया। इस वीर अमर सपूत के सम्मान में बीकानेर के महाराजा जोरावर सिंह जी ने बीकानेर के किले जूनागढ़ में स्मारक  बनवाया और रासीसर गांव की 💰🏛जागीरी प्रदान की ऐसे वीर सपूत जगराम सिंह जी राजपुरोहित सेनापति पर पूरे राजपुरोहित समाज को और पूरे बीकानेर वासियों को गर्व है। श्री जगराम सिंह जी राजपुरोहित की पुण्यतिथि का कार्यक्रम हर वर्ष बीकानेर के किले जूनागढ़ में रखा जाता और 276 वी पुण्यतिथी पूर्ण हो चुकी है और बीकानेर के किले जूनागढ़ में इनकी हमेशा पूजा की जाती है
🚩जय जय दाता री सा  🚩
रॉयल बन्ना अर्जुन सिंह जी सेवड़
  राजपुरोहित (शैतान सिंह)
         ठिकाना रासीसर
निवासी 🏛नोखा (बीकानेर.राज)


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