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2.11.25
राजपुरोहित समाज एक ऐसी जाति है जिसे बहुत उच्च दर्जे से देखा जाता है
30.6.25
राजगुरूओ के गाँव गौत्र और जिले
1 - राजगुरू - सभी राजगुरू अजारी से निकले है । जिन - जिन को ग्राम स्थान मिले उसके पीछे इनके पुर्वजो कि शोर्यशाली गाथांए रही है । उन
सभी को दर्शाना चाहें तो एक मात्र राजगुरू गौत्र पर ही एक ग्रंथ तैयार हो सकता है । इस लिए हम यहाँ सिर्फ राजगुरूओ के गाँव गौत्र और जिले
ही दर्शायेंगे ।
डूंगरी - राजगर
2 गोलवाडा - सटीयातर राजगर
3 - सेवाडीया - सटीयातर+ हिंडवाडीया 4
रानीवाङा खुर्द - सटीयातर + पंड्या 5 - जैतपुर -
सटीयातर 6 - सेवदा - सटीयातर
7 - करडा - सटीयातर
8 - चितरूडी - पादरेसा
तहसील - भीनमाल
9 - पूनासा - राजगर
10 - भीनमाल - राजगर
11 - नासोली - राजगर
12 - धसैडी - राजगर
13 - सलतरा - राजगर
तहसील सांचौर
14 - सांचौर - राजगर + पंड्या + औझा 15 -
भावतङा - राजगुरू
16 - तांपी - राजगुरू +वीरपुरा + राजगर 17 - रतैङा -
राजगर
18 - जान्वी - फोणरीया
19 - आंबली - राजगर + पंड्या + औझा 20 -
हिंडवाडा - राजगर
21 - चितलवाना - राजगर + वीरपुरा 22 - कैरीया -
वीरपुरा + राजगर
23 - रणौधर - राजगुरू
24 - हैमागुडा - पंड्या ( राजगुरू ) 25 - सिवाङा -
राजगुरू
26 - झोटडा - राजगुरू
27 - देवङा - राजगुरू
28 - धमाना - राजगुरू + पंड्या
( राजगुरू )
29 - धुंम्बडीया - राजगुरू
30 - तात्रा - राजगुरू + पंड्या 31 अन्खोल -
पंड्या ( राजगुरू ) 32 - भाडवाल - पाडे ( पंड्या )
जनश्रुतियों के भहुमत के आधार पर कि पंड्या राजगुरू
ही है । इसीलिए हमने बुजुर्गों को मान्यता दी ( राव
भी इसकि पुष्टि करते है ।) इन्ही के द्वारा स्वीकार
किया गया है । कि इनका गाँव लुणावास के पास
जो स्थित है । एंव मूल में राजगुरू ही है । 33 - जोधावास
- औझा
34 - दैवङा - राजगर
35 - भदरूना - राजगर
36 - गोलासना - पंड्या सरकार
( पंड्या के आगे सरकार कैसे
लगा इसकि जानकारी नहीं हैं इसके लिए
माफि चाहुंगा )
37 - धुदवा - पोडे ( पंड्या राजगर ) 38 - मैदा -
पंड्या 39 - सुथडी - राजगर
40 - जोरदर - राजगर
41 - मैलावास - पंड्या
42 - सरवणा - पंड्या
43 - जयसला - पंड्या
सायला पंचायत समिति
44 - बवतरा - राजगर
45 - सुराना - राजगर
46 - टीलौडा - राजगर
47 - चौराउ - राजगर
जालौर पंचायत समिति
48 - बाकरा - मदपङ + बोहरा
49 - रायपुरीया - मदपङ
50 - डूडसी - वोरा
51 - समुजा - राजगर
आहौर पंचायत समिति
52 - भवरानि - राजगर
53 - गोविंदला - बोहरा
54 - नीलकंठ - बोहरा
55 - छीपरवाडा - बोहरा
56 - थानवाला - बोहरा ( राजगुरू ) 57 - पावटा -
राजगर
58 - गुडा बालोतरान - राजगुरू
59 - आगवाङी - राजगुरू
60 - रोडला - राजगुरू
61 - मूलेवा - बोहरा
62 - ओडवाङा - राजगर
जसवंतपुरा पंचायत समिति
63 गोलना - राजगर
जिनके आगे राजगर/राजगुरू नहीं लिखा है वो सब के सब
राजगर ही बोलते हैं पर हैं तो राजगुरू ही पर भाषा में
फर्क होने से राजगर बोलने लग गये। इसलिए
उनकि बोली में ही दर्शाया हैं । इसमें कई जगह +
का निशान लगा कर आगे दूसरी राजगुरू
जाती लिखी हैं उसका उस जगह एक से ज्यादा राजगुरू
जातीयाँ है ।
जिला सिरोही
सिरोही पंचायत समिति
64 - जवल - मदपङ ( राजगर )
65 - मनोरा - सनपुरा
66 - चाडुआल - आमैटीया
67 - फुंगणी - सनपुरा
68 - सनपुर - सनपुरा ( इसी गाँव के नाम पर
सनपुरा जाती का नाम
पङा )
69 - बरलूट - मदपङ
70 - आम्बलारी - सनपुरा
71 - बावली - मदपङ
रेवदर पंचायत समिति
72 - धान - राजगर
73 - निम्बज - कोठारीया
74 - सेलवाडा - राजगर
75 - पैंतीसरा - राजगर
76- वान - राजगर
77 सिरोडी - राजगर
78 - सनवाडा - राजगर
79 - असावा - राजगर
80 - धंधपुर - राजगर
पिंडवाडा पंचायत समिति
81 - भार्जा - राजगर
82 - उदारा - मदपङ
83 - अजारी - राजगर ( यह वही अजारी है
जहाँ राजगुरू कि उत्पत्ति हुई थी यहीं पर
इनकि कूलदेवी माँ सरस्वती का भव्य मन्दिर है , और
यहीं पर संसार कि पहली सति हुई है वो भी राजगुरू थे ।
अजारी के राजगुरूओ को छोङ और राजगुरू
यहाँ का पानी नही पीते 84 - कोतल - मदपङ + राजगर
85 - आर्दश डूंगरी - राजगर
86 - पिंडवाडा - राजगर
आबू रोङ पंचायत समिति
87 - और - राजगर
88 - खादत - राजगर
शिवगंज पंचायत समिति
89 - कैलाश नगर - राजगर ( मदपङ )
90 - मनदार - वोरा ( राजगर )
जिला बाडमैर
गुडामालानी पंचायत समिति
91 - जालिखाडा - राजगुरू
92 - भैलावा - राजगुरू
93 - बन्ता - राजगुरू
94 पाडा - राजगुरू
95 - उधाडी - राजगुरू
96 - पोयला काला - राजगुरू
97 - पादर्ली - राजगुरू
98 - पीपराली रोली - राजगुरू
99 - पायला खुर्द - राजगुरू
100 - सिन्धरी - राजगुरू ( भंवरीया ) 101 - धन्वा -
राजगुरू
बाडमैर पंचायत समिति
102 - बालैरा - राजगुरू
103 - गैन्हु - राजगुरू
104 - लांगैरा - राजगुरू
105 - रड्वा - राजगुरू
106 - कनौङ - राजगुरू
( भंवरीया )
107 - महाबार - भंवरीया
( राजगुरू )
तहसील सीवाना
108 - गुडानाल - राजगुरू
109 - लुडराडा - राजगुरू
110 - पादरू - राजगुरू + भंवरीया 111 - समनीया -
राजगुरू
112 - सिलौर - राजगुरू + पांड्या ( यह वही सिलौर
है, जो भगवान श्रीराम जी के विवाह में वशिष्ठ
जी को राजा दशरथ जी ने जागीरी में दी थी । और
इसी गाँव के पिछे राजगुरू काफि सिलौरा कहने लगे ।
बुजुर्गों के अनुसार यह भी कहावत हैं कि "संसद बङी कै
सिलौर"
इसका यह अर्थ है कि राजा महाराजाओ के शासन मैं
सिलौर से बङी संसद नही था । मैं बलवन्त सिंह राजगुरू
( सिलौरा ) कोलासर । )
113 - सिवाना - राजगुरू
चौहटन
114 - खाखूसर - राजगर
115 - वयानो कि ढाणी - राजगर
116 - चौहटन - राजगुरू
117 - सुरूपों का तला - राजगर
118 - मिया का तला - राजगर
119 - पमै का तला - राजगर पंचपदरा 120 - आराबा -
राजगुरू
121 - डोली - राजगुरू
122 - कनना - राजगुरू
123 - खर्वा - राजगुरू
124 - कल्याणपुरा - राजगुरू
125 - पटाउ - राजगुरू
126 - पंचपदरा - राजगुरू
127 - खेडा सोढा - राजगुरू
128 - थोब महेशा - राजगुरू
129 - ढैरीया - राजगुरू
तहसील शीव
130 - बालासर - राजगर
131 - वीसु खुर्द - राजगर
132 - जूडिया - राजगर
133 - वरीपाडा - राजगर
134 - धराई - राजगर
135 - राजदल - राजगर
136 - कोटडा - राजगर
137 - आकली - राजगर
जिला पाली
रोहित पंचायत समिति
138 पाति - राजगर
139 - वायद - बोहरा
140 - सीराणा - राजगर
141 - भंवरी - राजगर
142 - जवाडीया - बोहरा ( जवाली से आकर बसे )
143 - खेरवा - आमैटीया
144 - मौडल - आमैटीया
145 - बुसी - बोहरा
146 - चाचौङी - आमैटा + पांड्या
147 - दयालपुरा - राजगर
सोजत
148 - बलाडा - राजगर
149 - धनैरीया - राजगर
रायपुर
150 - झुठा - राजगुरू
मारवाड जक्शन
151 - आउवा - राजगुरू
152 - काडु - राजगुरू
153 - गुडा मोकन सिंह - राजगुरू 154 - धानला -
बोहरा ( राजगर )
155 - ईसाली - बोहरा
156 - देवली आउवा - बोहरा
157 - बाता रूगनाथगढ - बोहरा
158 - गदन - बोहरा
159 - मैलावास - राजगुरू
160 - हैमलीयावास खुर्द - आमैठा 161 - दूदाङ - मदपङ
देसूरी
162 - नदनाभतन - राजगर + पंड्या
163 - गीलारी - राजगर
164 - जावली - वोरा + आमैटा
165 - रानी गाँव - आमैटा
बाली सुमैरपुर
166 - दूजाना - मदपङ
167 - पुरखीया - राजगर
168 - पुराडा - राजगर
169 - सुमैरपुर - राजगर
170 - कौरटा - राजगर ( इन्हें चावण्डीया भी कहते है
चामुण्डा माता जी कि पुजा करने के कारण ) 171 -
बरवा - पीडीया ( राजगर )
172 - लुणावा - पीडीया
173 - बोया - राजगर
174 - बीजापुर - राजगर
175 - पीचवा - मदपङ
176 - बाली - राजगर
177 - श्री सेला - राजगर
178 - भीतवाल - राजगर
179 - खुडाला - राजगर
180 - फलाना गाँव - राजगर
181 - सदैराव - बोहरा
182 - ढोला - मदपङ
183 - पावा - राजगर
184 - धाना - राजगर
जिला जोधपुर
शेरगढ
185- बुडकिया - राजगुरू
186 - ऊँटाबर - राजगुरू
187 - खेजा - राजगुरू
188 - सुंथला - राजगुरू
फलोदी
190 - मौर्या मुझर - राजगुरू
191 -बाप - राजगुरू
192 - बावङी खुर्द - भंवरीया
( राजगुरू )
जोधपुर
193 - फिंच - राजगुरू
194 - लूणी जंक्शन - पीडीया
( राजगुरू )
195 - थबुकडा - पीडीया ( राजगुरू ) 196 - ओडा -
पीडीया ( राजगुरू )
197 - लूणावास काला - पीडीया ( राजगुरू ) 198 -
कदवाङ - राजगुरू
औसीयां
199 - बासणी राजगुरू - राजगुरू 200 - थोब - राजगुरू
201 - मथानीया - राजगुरू
202 - नैवरा - राजगुरू
203 - पंडित कि ढाणी - राजगुरू
204 - बारा - राजगुरू
तहसील भोपालगढ
205 - गढेरी - राजगर
206 - मलार - भंवरीया ( राजगुरू ) बीलाङा 207 -
जाटीयावास - राजगर
208 - बाला सती - राजगर
209 - बीलाङा - राजगर
210 - सिलारी - राजगर
211 - मालकौसनी - राजगर
जिला चूरू
212 - कोलासर ~ राजगुरू ( मैं बलवन्तरामेश्वर सिंह
राजगुरू दादोसा स्वर्गीय ठाकुर श्री कुम्भ सिंह
जी कोलासर ) 213 - धीरदैसर - राजगुरू 214 - डुंगरगढ़ -
राजगुरू
215 - जालैवु - राजगुरू
216 - भोजास - राजगुरू
धीरदैसर, डुंगरगढ़, जालैवु, भोजास ये चार गाँव पहले चूरू
जिले में थे, अब वर्तमान में बीकानेर जिले में हैं ।
जिला बीकानेर
217 - कोलायत - राजगर
218 - किशनासर - राजगुरू
219 - जयमलसर - राजगुरू
220 - कानासर - राजगुरू
221 - बीकानेर शहर - राजगुरू ( दूसरे गाँवों से आकर बसे )
222 - शिवनगर - राजगर
223 - गणैश वाङी - राजगुरू
जिला नागौर
224 - लैसल - राजगुरू
225 - चावण्डीया - राजगुरू
226 - बोरावङ - राजगुरू
227 - मीठङी - राजगुरू
228 - भाखररोङ - राजगुरू
229 - शंखवाथ - राजगुरू
230 - रींया - राजगुरू
231 - मादलीया - राजगुरू
232 - रैण - राजगुरू
233 - गौलाङा - राजगुरू
234 - जाटावास - राजगुरू
जिला अजमेर
235 - परड - राजगुरू
जिला जैसलमेर
236 - लाखा - भंवरीया ( राजगुरू ) 237 - फतेहगढ -
राजगुरू
जिला राजसंमद + उदयपुर
238 - सैवन्त्री - राजगुरू
जिला श्री गंगानगर
239 - सुरतगढ - राजगुरू
240 - पीलीबंगा - राजगुरू
241 - भालेलीया - राजगुरू
242 - हरीपुरा - राजगुरू
सीवाङा ( राजगुरू )
जिला जालौर
243 - फतापुरा - सीरवाङा ( 4 घर ) पुरे राजस्थान में
ये चार परिवार ही हैं । लेकिन ये सीरवाङा जाती के
बारे में कोई जवाब नहीं देते हैं । (शिक्षा) कि कमी के
कारण ।
डीसा के राव श्री कान्ती लाल जी, रतन जी, एंव
मादा जी के द्वारा विस्तृत चर्चा पर निर्णय
चोपङो के आधार पर कि ये वास्तव में राजगुरू ही है ।
सीरवाङा गाँव के पीछे इन्होंने अपनी मूल
जाती को छोङ दीया और गाँव
को ही जाती मान लिया इसमें हमारा दोष नहीं हैं ।
यजमान समर्थन हैं । इनको बार बार कहने पर
भी सीरवाङा ही कहते हैं । बलवन्त राजगुरू ( सिलौरा )
कोलासर चूरू मो. 08696201712
Mail - balwant.rajpurohit1@gmail.com
राजगुरु वंश कि कुलदेवी सरस्वती माता अजारी तहसील पिंडवाड़ा सिरोही
26.5.24
आईए जानते हैं बिछावाडी गांव का इतिहास
11.6.23
मारवाड़ राज्य में राजपुरोहितो का अतुल्य योगदान
26.6.22
राजपुरोहित जाति का इतिहास की कुछ बुको के नाम ओर कहा मिलेगी
7.4.22
राजपुरोहित राज ऋषि श्री सोमायत जी मुथा
30.7.21
राजगुरु परिवारो का गांव का वितरण
26.2.21
श्रीमती सुनीता कंवर राजपुरोहित के प्रधान निर्वाचित होने के बाद प्रथम बार किशनगढ़ आगमन पर भव्य स्वागत
9.8.20
राव सीहा के पुत्र राव आस्थान ने गोहिलों व डाभियों को हराकर खेड़ जीत लिया.
● साफा और मारवाड़ के राठौड़ ●
राव सीहा के पुत्र राव आस्थान ने गोहिलों व डाभियों को हराकर खेड़ जीत लिया और कालान्तर में जब उसके प्रपौत्र राव कनपाल(१३१३-१३२३ई.) के समय महेवे का सारा भू-भाग राठौड़ों के अधिकार में आ गया। तब से राठौड़ों की सीमा जैसलमेर को छूने लगी। जिससे भाटियों-राठौड़ों के बीच समय-समय पर झगड़े होने लगे। तब कनपाल के ज्येष्ठ पुत्र भीम ने भाटियों को हराकर काक नदी से पश्चिम की ओर धकेल दिया। तब से दोनों की सरहद नियत हो गई। जिसका ये सोरठा प्रसिद्ध है-
आधी धरती भीम, आधी लोदरवै धणी।
काक नदी छै सीम, राठौड़ां ने भाटियाँ।।
[आधी धरती भीम की और आधी धरती लौद्रवै के शासकों(भाटियों) की है, काक नदी भाटियों व राठौडों के राज्य की सीमा रेखा है]
चूँकि ये सीमा महेवे के शासकों ने बलपूर्वक तय की थी, अत: भाटियों ने इसे नहीं माना और वे राठौड़ों के विरूद्ध मुल्तान के मुसलमानों व अमरकोट के सोढों को ले आए।
ई.1323 में इनके मध्य हुए युद्धों मे पहले भीम व बाद में राव कनपाल दोनों ही लड़कर काम आए और कनपाल का दूसरा पुत्र जालणसीं (१३२३-१३२७) अब महेवे का नया शासक बना।
अमरकोट के सोढा भाटियों का साथ देने से अब राठौड़ों के नये दुश्मन बन गये और ये लोग भी यदा-कदा महेवे के गाँवों को लूटने लगे।
इन्हीं दिनों राव जालणसीं ने एक वृक्ष विशेष को 'अमर' घोषित कर दिया और इसके फल-फूल, पत्तियाँ-टहनी इत्यादि काटने पर प्रतिबंध लगा दिया। 'जोधपुर राज्य की ख्यात' के अनुसार ये वृक्ष "चाँदणी" नामक गाँव में था। ये वृक्ष कौनसा था इसके प्रमाण नहीं मिलते।
सोढा राजपूतों को जब इस वृक्ष का पता चला तो उन्होंने राव जालणसीं को चिढाने के लिये इस वृक्ष को मसखरी में काट दिया। जिससे राठौड़ों और सोढों में युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान सोढों के सरदार दुर्जनशाल के सिर का साफा राव जालणसीं ने छीन लिया। राव जालणसीं विजयी हुआ।
विजय की याद के उपलक्ष्य में राठौड़ों ने साफा पहनना शुरु कर दिया। कहीं-कहीं ख्यातों में लिखा है राठौड़ों ने तब से विजय स्वरूप साफे को कानों तक पहनना शुरु कर दिया। परंतु ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ से पता चलता है कि राठौड़ इस घटना से पूर्व लगभग १३२३ ई. से तक तो साफा या पगड़ी नहीं पहनते थे।
राव सीहा के पाली के बाँगड़ म्यूजियम स्थित देवली से पता चलता है कि राव सीहा के सिर पर कोई पगड़ी या साफा या मुकुट नहीं है। मूर्ति में उनके घुँघराले बाल दिखाई देते हैं जो बँधे हुए हैं। सीहा के आगे एक सती हाथ जोड़े व पैरों में एक मनुष्य पड़ा है। इस स्मारक के नीचे का अभिलेख १२७३ ई. का है। इससे भी राठौड़ शासकों के तब तक साफा नहीं पहनने के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं।
ये शोध का विषय है क्योंकि राजवी लोग उस समय की परंपरा अनुसार सिर पर कुछ न कुछ तो अवश्य धारण करते होंगे। या हो सकता है राठौड़ शासक कुछ नहीं भी धराण करते हों। राव जालणसीं इत्यादि के समकालीन वीर पाबूजी अपनी एक ओर झुकी हुई पाग के लिये प्रसिद्ध रहे हैं। किंतु पाबूजी के देवलोक का समय क्या रहा, इस पर विद्वानों में मतभेद पाया जाता है।
संलग्न चित्र:
"राव सीहा की देवली" व "अभिलेख" (हालांकि सिर धुँधला दिख रहा है, पर नग्न है)
सन्दर्भ ग्रंथ
१.जोधपुर राज्य की ख्यात २. मारवाड़ का इतिहास- पं. विश्वेश्वरनाथ रेऊ ३. मुहणोत नैणसीं की ख्यात
भेजने वाले लेखक श्री दिनेशपाल सिंह बीसूकलां
http://sawaiagra.blogspot.com/2018/06/blog-post.html
22.9.19
पांचलोड़ का इतिहास जो रमणीया से आये थे
जोधपुर के पश्चिमी उत्तर दिशा में 30 किलोमीटर दूर है चावण्डा गाँव। यहां पर राव की चौपाईयोँ ओर गांव के इतिहास अनुसार लांछा देवी पुरोहित पहाड़ी पर देवी माँ की पूजा उपासना करती थी। देवी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि जब भी आप याद करोगे मैं हाजिर हो जाऊंगी। राव सीहा के वंशज वीरमदेव के पुत्र और प्रथम प्रतापी शासक चुंडा जी राठौड़ बाड़ी की पहाड़ियों में यहाँ वहां घूम रहे थे।यहां पर जब एक कन्या को इस तरह चावण्डा पहाड़ी पर देवी के मंदिर में भक्ति करते हुए देखा। तो उन्होंने कहा की माँ से पूछना की राव चुंडा के जीवन में राजपाठ लिखा हुआ है।लाछा बाई ने कहा कि मैं आपके बारे में माता जी से बात करूंगी। लाछा बाई ने मां भवानी की अराधना कर पूछा मां एक राठौड़ कुल का नौजवान यहां भटक रहा है ।
चामुंडा देवी ने कहां की है बेटी चुंडा जी राठौड़ का राज सुख लिखा हुआ है। जैसा मैं कहूंगा वैसा करोगी तो राजपाट भी होगा। उसी कथन के अनुसार राव चुंडा जी ने किया जिन्होंने मंडोर दुर्ग को मांडू के सूबेदार से जीतकर अपनी राजधानी बनाया था।चुंडा जी राठौड़ ने राजा बनने के बाद लाछा बाई को 4 गांव पीहर पक्ष को और चार गांव ससुराल पक्ष को जागीरी के रूप में दिए जिनमें से यह चावण्डा गांव भी हैं जहां के पांचलोड तेजाजी के साथ लाछो बाई का विवाह हुआ। आज चावण्डा गांव के राजपुरोहित मां चामुण्डा के कारण चावण्डिया कहलाने लगे।।
प्रेमलजी पाचलोड़ र दुहा में वर्णन // मेंमद गोरी ने मारियो सजन भायल रे संग लाख पसाव रो दोन दियो प्रेमल पाँचलोड ने रंग ।। गज मोणक। घोड़ा अपे सोना तणो सिरपाल एकण हाथ समापियो प्रेमल लाख पसाव ।। अम्बाड़ी समेत हस्ती अपे मोहरों तीन सौ सार प्रेमलदिनी पाँचलोड जणे हीरो मण्डोणी हार ।। पाँचलोड़ पारा रूसी वीरम वंश विचार प्रेमल तणे पिरवार। ने देवो रंग दातार ।। जोधा जी ने जब जोधपुर नगर बसाया तो अपनी कुलदेवी मां चामुंडा जी का मंदिर मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थापित किया। जो आज विश्व विख्यात है।
राजस्थान की भव्यता का प्रतीक जोधपुर शहर अपनी बेमिसाल हवेलियों की भवन निर्माण कला,मूर्ति कला तथा वास्तु शैली के लिए दूर-दूर तक विख्यात है। इसी शहर के लगभग 400 फुट ऊंचे शैल के पठार पर स्थित है, भारत के सबसे विशाल किलों में से एक मेहरानगढ़ का भव्य किला।
किले की छत पर विराजमान यह मंदिर अपनी मूर्ति कला तथा उत्तम भवन निर्माण कला की एक अनूठी मिसाल है, जहां से सारे शहर का विहंगम दृश्य साफ नजर आता है। मेहरानगढ़ किले में प्रवेश मार्ग से सूर्य की आभा का आभास देते श्री चामुंडा देवी मंदिर में प्रवेश करने का मार्ग आसपास बनी आकर्षक मूर्तियों से सुसज्जित है। मंदिर में स्थापित मां भवानी की मूर्ति मगन बैठी मुद्रा की बजाय चलने की मुद्रा में नजर आती है। मां चामुंडा देवी को अब से करीब 550 साल पहले मंडोर के परिहारों की कुल देवी के रूप में पूजा जाता था |इस किले में एक भव्यता का प्रतीक मां जगदम्बा चामुंडा का मंदिर भी स्थित है, जो किले के दक्षिणी भाग में सबसे ऊंची प्राचीर पर स्थित है। श्री चामुंडा देवी का यह मंदिर जोधपुर राज परिवार का इष्ट देवी मंदिर तो है ही, बल्कि लगभग सारा जोधपुर ही इस मंदिर की देवी को अपनी इष्ट अथवा कुल देवी मानता है।
इतिहास
इस मंदिर में देवी की मूर्ति 1460 ई. में चामुंडा देवी के एक परमभक्त मंडोर के तत्कालीन राजपूत शासक राव चुंडा के पुत्र राव जोधा द्वारा अपनी नवनिर्मित राजधानी जोधपुर में बनाए गए किले में ही स्थापित की गई। पहले मां चामुंडा को जोधपुर और आस-पास के लोग ही मानते थे और इनकी पूजा अर्चना किया करते थे |
लेकिन मां चामुंडा में लोगों का विश्वास 1965 के युद्ध के बाद बढ़ता चला गया |
लोगों की आस्था बढ़ने के पीछे की वजह के बारे में कहा जाता है कि जब 1965 का युद्ध हुआ था, तब सबसे पहले जोधपुर को टारगेट बनाया गया था और मां चामुंडा ने चील के रूप में प्रकट होकर जोधपुरवासियों की जान बचाई थी और किसी भी तरह का कोई नुकसान जोधपुर को नहीं होने दिया था | तब से जोधपुर वासियों में मां चामुंडा के प्रति अटूट विश्वास है |
मंदिर के पुजारी ने कहा कि मां चामुंडा का परचम इतना लहराया है कि आज जोधपुर से बाहर शायद ही कोई ऐसा गांव या शहर ऐसा होगा, जहां मां चामुंडा को लोग नहीं मानते और जानते हों | इसी वजह से देश और विदेश की जानी मानी हस्तियां जोधपुर में आकर अपने मांगलिक कार्य पूरे करते है |
पीहर और ससुराल के पक्ष में चार चार गांव कौन से हैं उनके नाम इस प्रकार है
पीहर पक्ष के बम्बोर, भाटेलाई, हिंगोलो,नेहड़ली,
ससुराल पक्ष के चावण्डा,भैसेर,इटावा,झाड़ासनी,
जानकारी देने के लिए श्री मदनसिंह चावण्डा (मरूधर भारती न्यूज़ ) का धन्यवाद
5.8.18
राजपुरोहित को जानना चाहते हो? मैं आपको बताता हूँ कि राजपुरोहित कौन है...अभय सिंह जसोल
19.6.18
सुमेरपुर के लौह पुरुष स्वतंत्र सेनानी वीर बाबूलालजी राज्यगुरु !
सुमेरपुर के लौह पुरुष स्वातंत्र्य #वीर बाबूलालजी राज्यगुरु !
जननी जने तो ऐसा जने के दाता के सुर।
नि तो रीजे बाँझडी तू मत गवा जे नूर।।
#पर्व है पुरुषार्थ का, दीप के दिव्यार्थ का🚩🔥
#स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी, सुमेरपुर के प्रथम #सरपंच, राजपुरोहित समाज की आन बान शान , 36 कॉम के सारथी लोकनायक श्री बाबुलालजी राजगुरू जी की #पुण्यतिथि पर सादर नमन. सुमेरपुर के इतिहास में राजगुरू जी एक ऐसे जन नायक के रूप में पहचाने जाते हैं जिन्होंने अपने #क्रांतिकारी चिंतन से सर्व समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सुमेरपुर के, सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया।
जन्म - सन 1911 पलासिया खुर्द(जालोर)
मृत्यु- 19/06/1962 ऊंदरी(सुमेरपुर)
सुमेरपुर के लोहपुरुष श्री बाबूलाल राजगुरु सन 1936 में इन्होंने सुमेरपुर की एक जिनिंग फैक्ट्री में हो रहे मजदूरों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और मजदूरों का संगठन एक आंदोलन खड़ा कर दिया पर उस जमाने में पुलिस और हुकूमत तो मालिकों के हाथ थी मजदूरों का कोई रक्षक था ही नहीं फलस्वरुप राजगुरु जी पर झूठे मुकदमे लगाकर उन्हें जेल की सजा भुगतनी पड़ी इसके बाद सुमेरपुर की सीमा से लगे सिरोही राज्य के शिवगंज कस्बे के निवासी श्री देवी चंद सागरमल के माध्यम से राजू गुरुजी का संपर्क सिरोही प्रजामंडल प्रमुख नेता श्री गोकुल भाई भट्ट से हुआ श्री गोकुल भाई के साथ उन्होंने सिरोही राज्य के गांव की जागरी जुल्मों के विरुद्ध आवाज उठाई उनके प्रचार ने संगठन में अपूर्व शक्ति पैदा की बाद में राज्य से निष्कासित कर दिया गया जागीरदारों से प्रभावित सामने पुलिस ने सन 1943 मैं इन्हें लोगों में बगावत करने का आरोप लगाकर हिस्ट्रीशीटर की सूची में दर्ज किया लगातार थाने में बुलाकर डराते धमकाते हैं तथा एक बार उनको झूठा फंसा कर जेल में डलवा दिया जिस पर उन्होंने महाराजा उम्मेद सिंह को कविता लिखकर न्याय की गुहार लगाई 51 वर्ष की अल्प आयु में पाली जिले के जागीरदारों भ्रष्ट सरकारी मुलजिमों मुनाफाखोरों व्यापारियों एवं गरीब जनता के शोषण के खिलाफ संघर्ष करते हुए जनता को पूर्ण रुप से स्वतंत्रता दिलाकर दिनांक 19 6 1962 में अस्त हो गया किंतु आज भी सुमेरपुर की जनता उनका नाम सुनकर सम्मान मैं सर झुका देती है बचपन का बहुत ही गरीब परिवार में गुजरा गांव गांव जाकर किताबें बेची साधनों के अभाव में नंगे पैरों यात्रा करके अपने जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाएं सके और वह सहारा उन्हें पत्रकारिता के रूप में मिला|!
जाने कैसे लोग थे जो देश हित के बारे में सोचते थे आज तो हर आदमी खुद के स्वार्थ में ही लगा है।
नमन उन महान लोगो को जो वाकई महान थे सिर्फ मीडिया या जनता को दिखाने के लिये देशहित का ड्रामा नही करते।
लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य-लेखे, विजय के उद्घोष! गीता के कथन!
आपको सत सत नमन है! 🙏💐
#महादेव🚩
🙏राजगुरु साहब अमर रहे🙏
7.10.17
राजपुरोहित का मूल आधार सदाचरण और नैतिकता
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8.9.17
Patlisar Purohitan के बारे जानकारी
यह शिल्लालेख पातलीसर में पुराने कुवे के पास लगा हुआ है।
इस पर कुछ लिखा है जो स्पष्ट दिखाई नहीं देता है, ऊपर की दो लाइन में कुछ-कुछ समझ आता है ,,
जो शायद गांव की स्थापना की सन् है वो है विक्रम सम्वत् १३२८(1328) वर्ष बसा, निचे की लाइन इस प्रकार है
सरिता, गणेशराम आगे कुछ दिखाई नहीं देता है,
क्योंकि मनुष्य के क्रूर हाथों ने इस शिल्लालेख से अपने औजारो की धार बनाने के घर्षण करके मिटा दिया है,
जिससे गांव के इतिहास का कोई पता नहीं चल पाया है,
किसी ने कहा है की इस गांव की स्थापना कोई पातूराम नाम के व्यक्ति ने की थी ।। सही जानकारी आज कही नहीं मिल रही है।
पातलीसर पुरोहितान
31.5.17
रासीसर गांव के सेवड़ राजपुरोहितों का इतिहास वीर-गाथा
सवत् 1797 मे मात्र 22 वर्ष की आयु में जोधपुर रियासत के महाराजा श्री अभय सिंह जी ने विद्रोही सरदारों के साथ मिलकर बीकानेर रियासत पर आक्रमण कर दिया। फलस्वरूप महाराजा जोरावर सिंह जी एव उनके कुंवर गजे सिंह जी को सेना सहित बीकानेर के किले जूनागढ़ में ही घेर लिया गया।इस विकट स्थिति में वीर सेनापति एव रणबांकुरे श्री जगराम सिंह जी राजपुरोहित ने अपनी वीरता का कौशल दिखाया और विरोधी सेना को नागौर तक खदेड़ कर ⚔लहू-लुहान ⚔🚩स्थिति में विजय श्री का संदेश महाराजा सा को देकर नश्वर-शरीर त्याग दिया। इस वीर अमर सपूत के सम्मान में बीकानेर के महाराजा जोरावर सिंह जी ने बीकानेर के किले जूनागढ़ में स्मारक बनवाया और रासीसर गांव की 💰🏛जागीरी प्रदान की ऐसे वीर सपूत जगराम सिंह जी राजपुरोहित सेनापति पर पूरे राजपुरोहित समाज को और पूरे बीकानेर वासियों को गर्व है। श्री जगराम सिंह जी राजपुरोहित की पुण्यतिथि का कार्यक्रम हर वर्ष बीकानेर के किले जूनागढ़ में रखा जाता और 276 वी पुण्यतिथी पूर्ण हो चुकी है और बीकानेर के किले जूनागढ़ में इनकी हमेशा पूजा की जाती है
🚩जय जय दाता री सा 🚩
रॉयल बन्ना अर्जुन सिंह जी सेवड़
राजपुरोहित (शैतान सिंह)
ठिकाना रासीसर
निवासी 🏛नोखा (बीकानेर.राज)
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