एक व्यक्ति का त्याग, पूरे समाज के लिए प्रेरणा
आदरणीय एडवोकेट घीसू सिंह राजपुरोहित रूपावास (पूर्व सरपंच रूपावास) से समाज को सीख लेनी चाहिए।
हाल ही में आदरणीय एडवोकेट घीसू सिंह राजपुरोहित जी से मुलाकात कर गांव और समाज के प्रति उनके विचारों को जानने का अवसर मिला। उनसे बातचीत के दौरान उनकी भावनाओं, दूरदर्शिता और गांव की एकता के प्रति समर्पण को देखकर मन में एक ही विचार आया कि यदि राजपुरोहित समाज का प्रत्येक बंधु इसी सोच के साथ आगे बढ़े, तो हमारा समाज और हमारे गांव निश्चित रूप से नई ऊंचाइयों को छू सकते हैं।
पिछली हार से मिली सीख, इस बार एकता से मिली जीत!
आदरणीय घीसू सिंह जी ने बताया कि पिछली बार पंचायत चुनाव में सामान्य सीट होने के बावजूद समाज के कई बंधु चुनाव मैदान में उतरे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अन्य समाज के ओबीसी वर्ग के उम्मीदवार ने जीत हासिल की। चुनाव परिणाम के बाद समाज के सभी भाई मंदिर में एकत्रित हुए और इस बात पर आत्ममंथन किया कि यदि हम एकजुट रहते, तो परिणाम कुछ और हो सकता था। उस समय सभी ने भविष्य में एकता बनाए रखने का विश्वास दिलाया था।
लेकिन लगभग सात वर्ष बाद जब पुनः सामान्य सीट पर चुनाव लड़ने का अवसर आया, तब समाज के कुछ बंधु एकता की बात करने के बावजूद अलग-अलग दावेदारी करने लगे। यह देखकर घीसू सिंह जी को गहरा दुख हुआ। उनके मन में एक ही चिंता थी कि कहीं पिछली बार जैसे हालात फिर से न बन जाएं और समाज को दोबारा पछताना न पड़े।
स्वयं की दावेदारी छोड़कर गांवहित को प्राथमिकता दी!
घीसू सिंह जी स्वयं सरपंच पद के लिए दावेदारी कर चुके थे। उनके पास चुनाव लड़ने का पूरा अवसर था, लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर गांव और समाज के भविष्य के बारे में सोचा।
उन्होंने अपने परिवार के बच्चों से भी विचार-विमर्श किया और अंततः गांव की एकता एवं व्यापक हित को प्राथमिकता देते हुए अपनी दावेदारी से पीछे हटने तथा समाज के योग्य बंधु का समर्थन करने का निर्णय लिया।
इसके बाद उन्होंने अपने परिवार, समर्थकों और 36 कौम के साथियों को साथ लेकर सरपंच उम्मीदवार आदरणीय बाबू सिंह जी राजपुरोहित का समर्थन किया।
यह केवल चुनाव से पीछे हटने का निर्णय नहीं था, बल्कि समाज की एकता, गांव के सम्मान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को प्राथमिकता देने का उदाहरण था।
समझाने का प्रयास किया, गांव की मर्यादा के लिए संघर्ष किया!
घीसू सिंह जी ने बताया कि गांव में अन्य दावेदारों को भी समझाने का भरपूर प्रयास किया गया। उनसे निवेदन किया गया कि व्यक्तिगत दावेदारी से ऊपर उठकर गांव के व्यापक हित और सामाजिक एकता के बारे में विचार करें, लेकिन सहमति नहीं बन पाई।
इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी समर्थक टीम के साथ 36 कौम के लोगों से संपर्क किया, सभी समाजों के भाइयों से सहयोग का निवेदन किया और गांव की एकता एवं सम्मान के लिए पूरी मेहनत की।
अंततः बाबू सिंह जी राजपुरोहित की जीत हुई। घीसू सिंह जी ने इस जीत को किसी एक व्यक्ति या समाज की जीत नहीं, बल्कि पूरे गांव की जीत मानते हुए इसे ग्रामवासियों को समर्पित किया।
उनका मानना है कि इस बार भी अन्य समाज के उम्मीदवारों से कड़ी चुनौती थी। ऐसे में चारभुजा नाथ जी की कृपा, गांववासियों के पुण्य और एकजुट प्रयासों से यह सफलता मिली।
दूसरे चरण के चुनावों में समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश!
आदरणीय घीसू सिंह जी ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि प्रथम चरण में ऐसे कई गांवों में, जहां राजपुरोहित समाज की संख्या अच्छी होने के बावजूद एक से अधिक उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे, वहां दूसरे समाज के उम्मीदवारों को जीतने का अवसर मिला।
इसी अनुभव के आधार पर उनका दूसरे चरण में होने वाले पंचायत चुनावों के लिए सभी समाजबंधुओं से विनम्र निवेदन है कि जहां राजपुरोहित समाज की स्थिति मजबूत हो और दो या दो से अधिक उम्मीदवार चुनाव मैदान में हों, वहां समय रहते आपसी बातचीत, समझदारी और सहमति से गांव एवं समाज के हित में निर्णय लिया जाए।
यदि आवश्यकता पड़े, तो किसी एक बंधु को समाज और गांव की एकता के लिए अपनी दावेदारी छोड़ने का साहस दिखाना चाहिए। यह निर्णय किसी की हार नहीं, बल्कि सामूहिक भविष्य की जीत बन सकता है।
समाज के प्रत्येक बंधु के लिए एक संदेश!
राजनीति में दावेदारी करना गलत नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने का अधिकार है, लेकिन जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सामूहिक हित के बीच चुनाव करने का समय आए, तब समाज के हित को समझना ही सच्ची दूरदर्शिता है।
समाज की ताकत केवल हमारी संख्या में नहीं, बल्कि हमारी एकता, आपसी विश्वास और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता में है।
आदरणीय एडवोकेट घीसू सिंह राजपुरोहित जी ने अपने निर्णय से यह संदेश दिया है कि सच्चा नेतृत्व केवल पद प्राप्त करने में नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर पद की दावेदारी छोड़कर समाज और गांव को मजबूत बनाने में भी है।
आइए, हम सभी उनके इस निर्णय से प्रेरणा लें। आपसी मतभेद भुलाकर समाज की प्रतिष्ठा, गांव के सम्मान और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए एकजुट हों।
याद रखिए—जब समाज एकजुट होता है, तो उसकी आवाज मजबूत होती है; जब समाज बंटता है, तो उसका अवसर दूसरों के हाथों में चला जाता है।
एकता ही हमारी पहचान है। समाज का सम्मान ही हमारा स्वाभिमान है। गांव का विकास ही हमारा संकल्प है।
जय राजपुरोहित समाज! जय चारभुजा नाथ री! जय रघुनाथ जी री सा!




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